समकालीन शैक्षिक विमर्श में मूल्यांकन बहस का सबसे गंभीर परन्तु उपेक्षित मुद्दा बना हुआ है। शिक्षा के अधिकार कानून (RTE) ने इसे सामयिक बहस के केन्द्र में लाकर खड़ा कर दिया है। परीक्षा को ही मूल्यांकन का एकमात्र तरीका मान लिए जाने की आलोचना और इसमें सुधार की मांग बहुत लम्बे समय से होती रही है। आजादी के बाद बने सभी नीतिगत दस्तावेज परीक्षा केन्द्रित मूल्यांकन व्यवस्था की आलोचना करते हुए उसमें बदलाव की पेशकश करते रहे हैं। बदलाव की इस लम्बी जद्दोजहद के बाद शिक्षा के अधिकार कानून ने आरंभिक शिक्षा में प्रत्येक स्कूल के लिए सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) को अनिवार्य बना दिया है।

हालांकि हमारी संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा प्रणाली की जड़ें इतनी गहरे घुस चुकी हैं कि उसे आसानी से हिला पाना संभव नहीं है। सच तो यह है कि जब तक स्वयं शिक्षकों, अधिकारियों, नीति-निर्धारकों और स्कूल प्रबंधकों का मूल्यांकन के बारे में नजरिया नहीं बदलेगा और वे परीक्षा को ही मूल्यांकन का एकमात्र तरीका मानना बंद नहीं करेंगे, तब तक इसमें सुधार करना संभव नहीं।

हालांकि सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) को लागू करने की कानूनी बाध्यता के बावजूद शिक्षा व्यवस्था में इसको  लेकर कोई विशेष गंभीर प्रयास नहीं हो रहे हैं। कानूनी बाध्यता का एक परिणाम यह हुआ है कि सतत एवं व्यापक मूल्यांकन को स्कूल और बोर्ड  अपने-अपने तरीके से व्याख्यायित कर रहे हैं। इसे देखकर लगता है कि यदि इसे गंभीरता से नहीं लिया गया तो यह संभावना भी है कि एक अलग तरीके से भविष्य में यह परीक्षा प्रणाली के शिकंजे को और मजबूत बनाने में मदद करेगा।

सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) पर चली आधी-अधूरी बहस का दूसरा नतीजा यह हुआ है कि जहां पहले स्कूलों में एक साल के दरम्यान चार-पांच परीक्षाएं (दो-तीन सत्र परीक्षाएं और एक अर्द्ध-वार्षिक तथा वार्षिक) होती थीं, अब वहां ये परीक्षाएं सतत होने लगी हैं। निजी स्कूलों में जहाँ अब बच्चे लगभग हर महीने परीक्षाएं दे रहे होते हैं, वहीं सरकारी स्कूलों की स्थिति इस मामले में और भी निराशाजनक और डावांडोल है। सबसे गंभीर बात यह है कि उन्हें अभी तक यह नहीं मालूम है कि सतत एवं व्यापक मूल्यांकन के नाम पर करना क्या है और कैसे करना है?

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 को आए करीब नौ  साल और शिक्षा के अधिकार कानून को लागू हुए चार  साल पूरे होने के बावजूद धरातल पर व्यवहारिक तरीके से सतत एवं व्यापक मूल्यांकन को कैसे लागू किया जाए, इसे लेकर काफी उहापोह या सीधे कहें तो उदासीनता है। अर्थात् सतत एवं व्यापक मूल्यांकन की उचित समझ और इसे मुख्यधारा के स्कूली शिक्षा व्यवस्था में लागू कर पाने के उचित मॉडल क्या हो सकते हैं, इन दोनों ही क्षेत्रों में अंधेरा दिखाई देता है।



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