प्राइमरी का मास्टर डॉट कॉम के फैलाव के साथ कई ऐसे साथी इस कड़ी में जुड़े जो विचारवान भी हैं और लगातार कई दुश्वारियों के बावजूद बेहतर विद्यालय कैसे चलें, इस पर लगातार कोशिश विचार के स्तर पर भी और वास्तविक धरातल पर भी करते  है। चिंतन मनन करने वाले ऐसे शिक्षक साथियों की कड़ी में आज आप सबको अवगत कराया जा रहा है जनपद इटावा के साथी  श्री अवनीन्द्र जादौन जी से!  स्वभाव से सौम्य, अपनी बात कहने में सु-स्पष्ट और मेहनत करने में सबसे आगे ऐसे विचार धनी शिक्षक  श्री अवनीन्द्र जादौन जी  का 'आपकी बात' में स्वागत है।

इस आलेख में उन्होने शिक्षा की स्थिति और शिक्षकों के सम्मान को लेकर मीडिया और समाज की स्थिति का आंकलन किया है।  हो सकता है कि आप उनकी बातों से शत प्रतिशत सहमत ना हो फिर भी विचार विमर्श  की यह कड़ी कुछ ना कुछ सकारात्मक प्रतिफल तो देगी ही, इस आशा के साथ आपके समक्ष   श्री अवनीन्द्र जादौन जी  का आलेख प्रस्तुत है।



 
जहां सरकारी प्राथमिक शिक्षा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है वहीं  शिक्षक अपने सम्मान की


प्रतिदिन के समाचारों में सबसे अधिक चर्चा अगर किसी की दिखाई देती है तो वो है भारत के शिक्षक। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से लेकर प्रिंट मीडिया तक शिक्षकों की योग्यता और ज्ञान को लेकर भद्दे समाचार निकलना प्रतिदिन का नियम सा बन गया है। शिक्षक समाज की गरिमा को कलंकित करने बाले ये समाचार सभी शिक्षकों को समाज में नजर चुराने पर मजबूर कर रहे हैं। कक्षा 5 तक के पाठ्यक्रम को ना जानने बाले शिक्षकों के इंटरव्यू पूरे समाज में चर्चा का विषय बन चुके हैं। समाचार चैनल द्वारा दिखाए गए अनपढ़ शिक्षक विशेष की क्लिप सोशल मीडिया फेसबुक और व्हाट्स एप्प पर वायरल होकर सुर्खियां बटोर रहीं हैं और सभी शिक्षक अपने पास पड़ोस में एक अपराधी की नजर से देखा जा रहे हैं।
 
हालांकि इन समाचारों में दिखाए गए अध्यापक ना तो नकली नहीं हैं और ना ही इनके बारे में और इनके ज्ञान के बारे में दिखाई गयी ख़बरें गलत हैं,  पर ये सम्पूर्ण शिक्षक समाज का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं लेकिन समाचार दिखाए जाने के बाद आम जनमानस ने सरकारी शिक्षकों के प्रति नकारात्मक धारणा को अपना लिया है। आज हमारे शिक्षक समाज के कई लाख शिक्षकों में कुछ सैकड़ा ऐसे भी शिक्षक हैं जो वास्तव में ओलम् और गिनती तक का ज्ञान नहीं रखते है, पर क्या समस्त शिक्षकों को उनके ज्ञान से जोड़कर उनका उपहास उड़ाया जाना उचित है? इन अध्यापकों का इस विभाग में होना क्या इस पूरे सरकारी सिस्टम पर प्रश्न खड़ा नहीं करता है? इन्हें भर्ती करने वाली व्यवस्था पर चिंतन क्यों नहीं हो रहा है? इन्हें भर्ती करने वाले अधिकारियों पर प्रश्न क्यों नहीं किये जा रहे हैं?

वर्ष 1976 से पूर्व अध्यापक भर्ती के लिए आवश्यक अहर्ता बी टी सी प्रशिक्षण थी और इसमें प्रवेश हेतु योग्यता कक्षा 10 थी। अध्यापन में वेतनमान काफी कम होने के कारण कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति अध्यापक बनने को तैयार नहीं होता था इसलिए प्रशिक्षण में आवेदन करनें बाले लगभग सभी लोगों का चयन बी टी सी में हो जाता था भले ही ये कक्षा 10 में न्यूनतम 33 प्रतिशत योग्यता ही रखते हों।  अध्यापकों की कमी के चलते इन्ही बी टी सी प्रशिक्षण प्राप्त लोगों को कक्षा 10 पास योग्यता और बी टी सी प्रशिक्षण के आधार पर नौकरी दे दी जाती थी।  जिनमें से कुछ वर्तमान समय में भी कार्यरत हैं इनमे से अधिकांश वर्तमान समय में लागू नवीनतम पाठ्यक्रम को नहीं पढ़ा पा रहे है बाबजूद इसके लगातार पदोन्नति होने से पूर्व माध्यमिक विद्यालय में तैनात हैं ।1980 के बाद प्रशिक्षण की योग्यता इंटरमीडिएट कर दी गयी और लगातार इंटर और बी टी सी योग्यताधारी व्यक्ति प्रशिक्षण प्राप्त कर अध्यापक बनते रहे पर सरकारी स्कूल में पदों की मांग के मुताबिक राज्य सरकार अध्यापकों को भर्ती नहीं कर सकी और 1995 तक अधिकांश अध्यापक पुराने अध्यापक रिटायर हो गए।


1999 में उत्तर प्रदेश सरकार ने नए खोले गए विद्यालयों में शिक्षकों की कमी पूरा करने के लिए विशिष्ट बी टी सी के नाम से विशेष भर्ती अभियान चलाया जिसमे बीएड पास आवेदकों को उनकी स्नातक तक की शैक्षिक मेरिट के आधार पर भर्ती किया। इस भर्ती में कई जनपदों में आरक्षित वर्ग विशेषकर अनुसूचित जाति महिला विज्ञान की मेरिट काफी कम गयी और न्यूनतम 40 प्रतिशत तक भी महिलाएं चयनित हो गयीं। कुछ जनपदों में तो अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थी तक ना मिल सके ऐसे में आवेदन करने बाले सभी न्यूनतम योग्यता बाले अभ्यर्थियों का आसानी से चयन हो गया जिनका शैक्षिक ज्ञान भी अपेक्षाकृत कम ही था। हालांकि ऐसे चयनित अध्यापको की संख्या 5-10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी। वर्ष 1999 की भर्ती और पंचम वेतन आयोग में वेतन में बढ़ोत्तरी से युवाओं का इस तरफ रुझान एकदम काफी बढ़ा और लोग प्राथमिक शिक्षा में कैरियर बनाने को आतुर होने लगे।

2006 में भी मेरिट के आधार पर ही भर्ती की गयी यहाँ भी कुछ जनपदों में काफी कम मेरिट बाले अभ्यर्थी नियुक्त हुए।  साथ ही उन महाविद्यालयों से पढ़े छात्र भी भारी संख्या में चयनित हुए जो नक़ल करवाने में प्रदेश भर में बदनाम रहे हैं चूँकि इस भर्ती में भी योग्यता केवल मेरिट ही थी इसलिए अभ्यर्थियों और उनके अभिभावकों ने भविष्य के लिए मेरिट मैनेजमेंट प्रारम्भ कर दिया और जो छात्र कक्षा 10 में अध्यनरत थे उनके लिए 6 वर्षीय मेरिट मैनेजमेंट किया गया, जिसकी झलक 2007 और 2009 की भर्ती में दिखनी प्रारम्भ हो गयी और इन वर्षो में मेरिट काफी ऊँची हो गयी।  सीबीएसई के छात्रों के आवेदन के कारण यूपी बोर्ड के छात्र पिछड़ रहे थे इसलिए यूपी बोर्ड ने भी कक्षा 10 और 12 की परीक्षा में नंबर लुटाना शुरू कर दिया। अध्यापकों की भर्ती के मद्देनजर और विशिष्ठ बी टी सी में बीएड बालों के चयन के कारण प्रदेश में बीएड कारोबार उच्च स्तर पर पहुँच गया, और प्रदेश भर में जगह जगह नए बीएड कॉलेज खुलने लगे और डिग्रियां बांटी जाने लगी।  इनमे ज्यादातर कॉलेज सत्ता से नजदीकी रखने बाले पूँजीपतियों के हैं।  दूर दराज़ के अंचल में बीएड का कारोबार ज्यादा आसान था जहाँ अभ्यर्थियों को बिना जाये अधिकतम मार्क्स की गारंटी आसानी से मिल जाती है।  इन सबका का खुलासा प्रमाणपत्रों के सत्यापन में हुआ  और कई अभ्यर्थी चयनप्रक्रिया से बाहर किये गए और कई के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज़ कराई गई पर फिर भी कई बच गए होंगे इससे इनकार नहीं किया जा सकता है।

1999 के बाद ही शिक्षकों की कमी के चलते ग्राम पंचायत स्तर पर शिक्षा मित्रों की भर्ती प्रारम्भ हुयी जिसमे भाई भतीजा बाद से लेकर वोट वाद तक हावी रहा और कई जगह अत्यंत अयोग्य व्यक्ति भी चयनित कर लिए गए। पात्र व्यक्ति न्याय के लिए भटकते रहे और अंत में पंचायती राज की ताकत के आगे घुटने टेक गए। हालाँकि चयनित शिक्षा मित्रों के स्थानीय होने के कारण कई विद्यालयों को काफी फायदा भी हुआ ।



इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया को विद्यालयों से काफी मसाला मिल जाता है। अन्य विभाग में पत्रकारों का सीधे प्रवेश वर्जित है जबकि विद्यालय में ये कुछ भी करने को स्वतन्त्र है। पत्रकार कई विद्यालयों में जाकर अपनी रिपोर्ट तैयार करते हैं और जिन विद्यालयों में कमी मिलती है उन्हें हाईलाइट कर प्रचारित करते है। पर प्रश्न यह भी है कि क्या इन्हें अच्छे विद्यालय नहीं मिलते? क्या इन्हें योग्य अध्यापक नहीं मिलते? क्या इन्हें होशियार छात्र नहीं मिलते? यदि मिलते है तो उन्हें भी समाचारों में स्थान क्यों नहीं दिया जाता? क्या ये पूरे शिक्षक समाज को बदनाम करने की एक सुनियोजित साज़िश है?

क्या अच्छे कार्यो को प्रचारित करने का दायित्व मीडिया का नहीं है या मीडिया समाज में मंहगे कान्वेंट के लिए एक रास्ता तैयार कर रहा है और बदले में मोटा पारिश्रमिक प्राप्त कर रहा है ? पत्रकार कभी भी सरकारी विद्यालय में मुलभुत सुबिधाओं पर रिपोर्ट नहीं दिखाते है। पत्रकार पता नहीं क्यों एकल विद्यालय ,संसाधनों की कमी ,ग्रामीण परिवेश में अभिभावकों की शिक्षा के प्रति रूचि,बच्चों के खेत पर काम करने की मजबूरी , अधिकारियों के काम करने तरीके ,शिक्षकों की गैर शैक्षिक कार्यों में ड्यूटी जैसे अन्य मुद्दों को नहीं उठाते है। शायद उन्हें भी इसी प्राणी की बेइज्जती करना ज्यादा आसान लगता है।
      कुछ भी हो सरकारी प्राथमिक शिक्षा इस समय अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है और शिक्षक अपने सम्मान की।


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