🔴 विद्यालय में बच्चे खेलते हुए मिले, शिक्षक पेड़ के नीचे बातें कर रहे थे।

🔵 ब्लॉक में हुई क्रॉस चेकिंग, 10 शिक्षक गैरहाजिर, कटेगा एक दिन का वेतन।

🔴 कक्षा - 4 के छात्र ने नहीं सुनाया 6 का पहाड़ा, कक्षाध्यापक की वेतनवृद्धि रुकेगी।

🔵 विद्यालय का शौचालय मिला गन्दा, लापरवाही पर प्रधानाध्यापक निम्लबित।

कुछ ऐसी ही चटपटी मसालेदार सुर्खियाँ होती हैं समाचार पत्रों की; और हों भी क्यों न सारी कमियाँ केवल परिषदीय विद्यालयों और शिक्षकों में ही तो होती हैं। उन निजी विद्यालयों में बिल्कुल कोई कमी नहीं होती जिनकी मान्यता ही नहीं है या फिर जो दो कमरे के भवन में चल रहे हैं।

मित्रों स्पष्ट है कि हमारे अधिकारियों को जब चाहें तब परिषदीय विद्यालयों के निरीक्षण का अधिकार है और वो करते भी हैं। कई बार तो विद्यालय बन्द होने के 5 मिनट पहले तक वे विद्यालय में आ जाते हैं। 5 मिनट भी बहुत हो गए जी 2 मिनट ही पर्याप्त होते हैं गलतियाँ निकालने के लिए। सालाना ₹5000 विद्यालय विकास अनुदान और अधिकतम ₹10000 के अनुरक्षण अनुदान में टूटे लिंटर की रसोई पर टिप्पणी कर दी जाती है कि उसे ठीक क्यों नहीं करवाया गया। बरसात के दिनों में मैदान में पानी भर गया इसमें भी शिक्षक की ही गलती है। भले ही मैदान इतना बड़ा हो कि ₹20,000 की मिटटी पड़े। फिर बच्चे कम हैं और हैं तो उन्हें कुछ आता नहीं इसके बारे में मोटा - मोटा समाचार पत्रों में छपता है। कभी - कभी तो ऐसा प्रतीत होने लगता है कि बोल्ड फॉन्ट होते ही इसलिए हैं ताकि शिक्षक की गलतियाँ समाज को स्पष्ट रूप से दिख सकें। जबकि अच्छे शिक्षकों व अच्छे विद्यालयों की उपलब्धियों के बारे में छापने के लिए शिक्षक दिवस, बाल दिवस या किसी और राष्ट्रीय पर्व को ढूंढ़ा जाता है और हाँ जनपद में अच्छे शिक्षक भी 2-4 ही मिल पाते हैं मीडिया को, बाकि के 360 दिन परिषदीय विद्यालयों की नकारात्मक छवि से समाचार पत्र पटे रहते हैं ।



चलिए मान लेते हैं कि अधिकांश शिक्षक गलत ही हैं। तो ये शिक्षक बन कैसे गए? क्या शिक्षकों की चयन प्रणाली गलत है? अच्छा - अच्छा क्षमा करें । मैं समझ गया आप क्या कहना चाहते हैं। आप कहना चाहते हैं कि शिक्षक बनते समय ये ठीक होते हैं पर जब नौकरी पक्की हो जाती है तब ये बच्चों पर ध्यान नहीं देते। चलिए ये भी ठीक। छात्र की उपलब्धि केवल अध्यापक पर ही निर्भर करती है उसके अभिभावकों पर नहीं ।यानि बच्चे धान लगाने जा रहे हैं और विद्यालय नहीं आते, तब भी अध्यापक की ही गलती है।

चलिए सब बातें मान लीं आपकी, पर अब तनिक निजी विद्यालयों की ओर बढ़िए। क्या दो कमरों के भवनों में चलने वाले ये विद्यालय परिषदीय विद्यालयों से श्रेष्ठ हैं?  क्या इनके अध्यापक, सरकारी अध्यापकों से अधिक योग्यता रखते हैं? क्या एक इंटर पास शिक्षक, बीएड या बीटीसी प्रशिक्षण प्राप्त से अधिक अच्छा पढ़ा रहा है? या फिर निजी विद्यालयों के छात्र सभी अधिगम लक्ष्य प्राप्त कर चुके हैं?

हमारे अधिकारियों को परिषदीय विद्यालयों के  निरीक्षण का अधिकार प्राप्त है तो क्या निजी विद्यालयों के निरीक्षण का अधिकार प्राप्त नहीं? क्या कभी अधिकारियों ने निजी विद्यालय क़े कक्षा - 4 के किसी कमजोर छात्र से 6 का पहाड़ा सुना है? क्या कभी ईंट वाले भवनों जिनमें लिंटर के स्थान पर छप्पर पड़ा है  ऐसे विद्यालय की तस्वीर मीडिया में निकलवाई कि कैसे फ़ीस देकर भी छात्रों की जान खतरे में है? परिषदीय विद्यालयों में टीईटी की वकालत करने वालों ने क्या कभी निजी विद्यालयों के उन शिक्षकों के बारे में  छापा है जो बीए तक नहीं? परिषदीय शिक्षकों द्वारा शिक्षक डायरी न भरे जाने पर एक दिन का वेतन काटने वालों ने क्या कभी निजी विद्यालयों के इंटर पास शिक्षकों से पूछा है कि बिना लेसन प्लान का नाम सुने बच्चों को क्या पढ़ा लेते हो ?

अधिकारियों को ये अधिकार है कि परिषदीय विद्यालयों का निरीक्षण करें निःसन्देह है, पर उन्हें निजी विद्यालयों का निरीक्षण करने का भी तो अधिकार है। क्या परिषदीय और निजी विद्यालयों के निरीक्षण में 50:1 का भी अनुपात है ???? शायद 500:1 का भी नहीं होगा।

हाल ही में प्रत्येक एबीआरसी को 25 परिषदीय विद्यालयों के निरीक्षण का अधिकार सौंपा गया पर क्या उन्हें एक भी निजी विद्यालय के निरीक्षण का अधिकार दिया गया?

नहीं दिया गया, पर क्यों ? बेसिक शिक्षा विभाग के अंतर्गत कक्षा 1 से 8 तक के सभी परिषदीय और निजी विद्यालय आते हैं फिर भी अधिकारी परिषदीय विद्यालयों का ही क्यों निरीक्षण करते हैं ? क्यों मीडिया भी निजी विद्यालयों के ब्लैक बोर्ड की गलतियों को उजागर नहीं करती? या फिर निजी विद्यालयों के भवन वास्तुकला का अद्भुत नमूना हैं, उनकी सुविधाएँ विश्वस्तरीय हैं और वहाँ के शिक्षक प्रतिभा में श्रेष्ठता की मिसाल है?

यदि ऐसा है तो किसी भी सरकारी भवन को बनाने से पहले निजी विद्यालयों के निर्माणकर्त्ता से राय लेनी चाहिए। निजी विद्यालयों की सुविधाओं का प्रचार-प्रसार यूनेस्को के आगे होना चाहिए और निजी विद्यालयों के शिक्षकों से माननीयों व प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशिक्षण लेना चाहिए।

ध्यातव्य रहे निजी विद्यालयों में वैसे भी वो शिक्षक पढ़ाते हैं जो कि सरकारी नौकरी को तुच्छ समझते हुए तय करते हैं कि उन्हें आजीवन निजी विद्यालयों की ही शोभा बढ़ानी है।

खैर अंत में फिर भी अधिकारी वर्ग से मेरा यही निवेदन रहेगा कि कृपा करके निजी विद्यालयों का भी निरीक्षण करते रहें और उनकी 'सकारात्मक' छवि तनिक सर्वजनिक भी करें ताकि हमें भी प्रेरणा मिले और हाँ शिक्षा के अधिकार अधिनियम की धाराएँ पढ़ - पढ़कर शिक्षकों को कोसने वाले मीडियाकर्मियों के धुरंधरों से भी आग्रह है कि विद्यालय का अर्थ परिषदीय विद्यालय ही नहीं होता वो निजी विद्यालय भी होते हैं जहाँ सरेआम डंडे से बच्चों को हाँका जाता है और महाविद्यालय का मुँह तक न देखने वाले अपने को शिक्षक कहते हैं।

( डिस्क्लेमर : यहाँ निजी विद्यालयों से तात्पर्य उन विद्यालयों से है जोकि गाँव - गाँव बिना मान्यता के चल रहे हैं या फिर  उन्होंने हेर-फेर से मान्यता प्राप्त की है । स्पष्ट है कि कुछ निजी विद्यालय बहुत अच्छा काम कर रहे हैं । परन्तु बहुतायत ऐसे विद्यालयों की है जो परिषदीय विद्यालयों के आगे नहीं टिकते । परन्तु 'प्राइवेट स्कूल' शब्द अभिभावकों को उस ओर खींच ले जाते हैं।  ) 

प्रांजल सक्सेना 
शिक्षक
रामपुर 

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  1. This is the perfect tag in a education depart no body no the teachers feeling

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