रटकर याद रखने का ज्ञान और मनोविज्ञान

रटने को लेकर धारणाएं चाहे जो हों, अब इसके सकारात्मक पहलू को भी देखा जाने लगा है।

आप रटकर क्या याद कर सकते हैं- गणित के फॉमरूले, पहाड़े, व्याकरण के सिद्धांत, प्रार्थनाएं? उपन्यासकार सलमान रुश्दी की राय में कविता रटकर याद रखी जा सकती है। इस वर्ष हे (इंग्लैंड का एक शहर) साहित्य महोत्सव में सलमान रुश्दी ने कहा कि कविताओं को रटकर याद करना अब एक भूली-बिसरी बात हो गई है, जबकि ऐसा करने से भाषा से हमारा संबंध बढ़ता है। कुछ लोग भले ही इससे सहमत न हों और कहें कि रटकर कविता याद करने से बच्चे उनके अर्थ से परिचित नहीं हो पाते। लेकिन वास्तव में ऐसी कोई बात नहीं है।इस संबंध में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के डेविड व्हिटली द्वारा शुरू प्रोजेक्टपोएट्री ऐंड मेमोरी में 500 से अधिक लोगों के सर्वे से पता चला है कि जिन्होंने रटकर कविताएं याद कीं, उनका कविता से ‘व्यक्तिगत संबंध’ बन गया। कविता की ध्वनि और उसके अर्थ से तो उन्हें प्रेम हुआ ही, उनका संबंध दैनिक जीवन की अन्य चीजों, और क्रिया-कलापों से भी बढ़ा। जो लोग कविता याद करते हैं, वह उनके लिए छपे या लिखे हुए पृष्ठ की अपेक्षा एक ‘जीवित’ वस्तु बन जाती है। यह दिल से सीखने या मन लगाकर सीखने का उल्टा है। 

पर जो लोग कई कविताएं जानते हैं, उनके लिए ज्यों-ज्यों समय बीतता है, कविता की समझ बढ़ती जाती है। पर अब स्कूलों में अध्यापक कविताएं याद कराने में हिचकते हैं। फिर भी अभी यह पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। लेकिन इन्हें रटने के और तरीके भी हैं। बच्चों को सुलाते समय मां-बाप, दादी-नानी जो लोरियां सुनाती हैं, उन्हें सुनकर बड़े होते बच्चे भी वे गीत याद कर लेते हैं। यह भी एक प्रकार का रटना ही है। मनोविशेषज्ञों का मानना है कि कुछ भी याद करना या याद रखना, जैसे संगीत की धुनें या कविता, हमेशा आपके साथ रहता है। यदि आप दिल से कोई चीज याद रखते हैं, तो इसका अर्थ है कि आपके मस्तिष्क में भी वह याद रहती है। 


रटने या रटाने का काम आमतौर पर तब किया जाता है, जब कोई चीज जल्दी याद करनी होती है, जैसे नाटक के कुछ संवाद या मोबाइल और टेलीफोन नंबर। रसायन विज्ञान की सारणी, गणित और विज्ञान के फॉमरूले और कानूनी धाराएं, इन सबको याद करने के लिए रटने का सहारा लिया जाता है। हालांकि अब कैलकुलेटर और कंप्यूटर से गणित के सवाल हल कर लिए जा सकते हैं, फिर भी एशिया और पूर्वी यूरोप के साथ मध्य-पूर्व के प्राय: सभी देशों के स्कूलों में रटने का पुराना तरीका ही प्रचलित है। रटना तब एक समस्या है, जब कक्षा में इस पर अधिक ध्यान देकर इसके लिए अधिक समय दिया जाता है। जब बच्चों का अधिकांश समय रटाने में समाप्त कर दिया जाता है, तो स्वाभाविक है कि शिक्षा की नींव मजबूत नहीं होती। यह याद रखना चाहिए कि रटना एक साधन है, साध्य नहीं। जब वह साध्य बन जाता है, तब सोचने की शक्ति भी प्रभावित होती है।

लेखक
महेंद्र राजा जैन
वरिष्ठ हिंदी लेखक
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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