सवालों में शिक्षा नीति


देश में शिक्षा के स्तर और नई शिक्षा नीति को लेकर बहस चरम पर है। देश की पिछली शिक्षा नीति 1986 में बनी थी जिस पर 1992 में पुनर्विचार हुआ। अब एक बार फिर केंद्र सरकार इस संजीदा मसले को लेकर मंत्रणा के दौर में है। सर्वशिक्षा अभियान और शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधानों में खामियां सामने आई है, जिसपर कई राज्यों ने नाखुशी भी जताई है। और इस पर नए सिरे से बहस भी तेज हो गई है। विशेष तौर से ‘‘नो डिटेंशन’ की नीति में बदलाव को लेकर पंजाब और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य काफी मुखर हैं। बच्चों को फेल न किए जाने के मानव संसाधन मंत्रालय के फैसले के खिलाफ भी विरोध के स्वर तेज हुए हैं। 

निसंदेह फेल न किए जाने की नीति से शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है। पांचवीं और आठवीं क्लास में बोर्ड परीक्षा खत्म करने से माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा के स्तर में भी काफी गिरावट आई है। कहने का मतलब है कि परीक्षा हर विद्यार्थी के लिए अहम होती है। उसका अपना एक महत्व होता है। परीक्षा बच्चों में गंभीरता, एकाग्रता और अनुशासन की सीख देता है। अगर इस कड़ी को ही कमजोर कर दिया जाएगा तो होनहार और अनुशासित विद्यार्थियों की कौम कैसे मजबूती पा सकेगी? 

यह तय भी साफ है कि परीक्षा के दबाव में बच्चे न केवल पढ़ाई के प्रति जिम्मेदार बने रहते हैं बल्कि अभिभावक भी सचेत रहते हैं। पंजाब के शिक्षा मंत्री की स्पष्ट मांग है कि शिक्षा के अधिकार कानून में बदलाव कर पांचवीं और आठवीं के स्तर पर परीक्षा को अनिवार्य किया जाना बेहद जरूरी है ताकि माध्यमिक और उच्च शिक्षा के स्तर को बेहतर किया जा सके। हां, सर्वशिक्षा अभियान की खामियों और इसे उत्पन्न संकट को लेकर भी बहस की गुंजाइश बनी है। जैसे कि, इस अभियान के तहत सिर्फ प्राइमरी स्कूल खोलने की ही होड़ मची हुई है। सबसे ज्यादा चिंता की बात दरअसल इसी अभियान के खोखलेपन में छिपी हुई है। अगर एक या दो कमरों में बच्चों को सिर्फ एक या दो शिक्षक ही चलाएंगे तो शुरुआती कदम में ही बच्चे बिल्कुल पिछड़ जाएंगे। और ऐसा हो भी रहा है। एक राज्य में हुए निजी सर्वे में खुलासा हुआ कि आठवीं क्लास पास करने वाले 60 फीसद बच्चे क्लास दो की किताबों को भी ठीक से नहीं पढ़ पा रहे थे। शिक्षा किसी भी देश के लिए उसे सर्वोच्च स्तर तक पहुंचाने का अहम माध्यम है। सो, इसके स्तर को बनाने की जिम्मेदारी भी सरकार की ही है। देखना है, पूरे मसले में जगजाहिर हुई खामियों पर सरकार किस तरह और कितनी तेजी से एक्शन मोड में आएगी।

साभार :- सम्पादकीय राष्ट्रीय सहारा
    
    
                                                       

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