कुपढ़ से अनपढ़ भले

स्कूल का मतलब होता है पढ़ाई और जो स्कूल न जाय वह अनपढ़ कहा जाता है। इसलिए स्कूल जाना जरूरी है। आज कई तरह के स्कूल खुल गए हैं और वे किस्म किस्म के वादे करते फिरते हैं। स्कूल अपने आगोश में ले कर बच्चे के दिमाग के साथ क्या करता है? और गैर स्कूली अर्थात अनपढ़ का दिमाग कैसा होता है? वह क्या कर सकता है? ये कुछ बेहद जरूरी और बुनियादी सवाल हो गए हैं क्योंकि हम स्कूल जाने को सार्वभौम बनाकर सामाजिक-आर्थिक क्रांति लाना चाहते हैं। भारत वाचिक परम्परा वाला देश रहा है और ज्ञान की धारा मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रही है। शायद इसीलिए लोग सूत्र शैली में ज्ञान को सुरक्षित करते थे और पढ़ कर भाष्य करते थे। इसके प्रमाण हैं कि अंग्रेजों के आगमन के समय पढ़ाई-लिखाई की अच्छी व्यवस्था थी, शायद ब्रिटेन से ज्यादा विद्यालय थे। जो लोग अनपढ़ वे भी शिक्षित थे पर आजकल स्कूल से निकलने वाले कैसे और कितने शिक्षित होते हैं, इसे लेकर लोगों के मन में दुविधाएं बढ़ रही हैं। हमारी शिक्षा व्यवस्था की जमीन पर जो अंग्रेजी शिक्षा का जो बिरवा रोपा गया और पौध लगी उसके परिणाम कई दृष्टियों से नुकसानदेह साबित हुए। स्कूल पर से और उसकी परीक्षा पण्राली से भरोसा उठ रहा है। हम इस विश्वास के साथ यात्रा शुरू किए थे कि स्कूली शिक्षा अच्छे नागरिक पैदा करेगी जो उन आवश्यक गुणों से मंडित होंगे जो प्रजातंत्र की सफलता के लिए जरूरी हैं। इस मंसूबे के पीछे की पवित्र भावना को लेकर किसी के मन में कोई संदेह नहीं है। पर, जिस तरह के स्कूल आज हैं और जो कुछ और जिस ढंग से पढ़ा-लिखा रहे हैं उसे लेकर लोगों के मन में आशंकाएं घर करने लगी हैं।मनुष्य को मस्तिष्क के रूप में एक नायाब उपकरण का तोहफा प्रकृतिप्रदत्त है। उस जन्मजात उपकरण की विशेषता है कि वह अपने अनुभव से खुद भी रचा जाता रहता है। साथ ही वह रचने वाले को भी रचता रहता है। उदाहरण के लिए यदि सामान्य रूप से शारीरिक विकास हुआ हो, बीमारी या कुपोषण न हो तो चीनी, जापानी या हिन्दी बोलने वाले परिवारों में उस उस भाषा को सीखने के लिए बच्चे यथासमय तैयार रहते हैं और अपने परिवेश से भाषा को स्वत: ग्रहण कर आत्मसात भी कर लेते हैं। आगे चल कर उसी के हिसाब से वे और सब कुशलताएं सीखते हैं। बच्चे को जैसा बना दें बन जाएगा और जैसा बनेगा वैसा ही करने लगेगा। मजे की बात यह है बच्चा वहीं तक सीमित नहीं रहता वह उसका भी अतिक्रमण करता है। वह दूसरी नई भाषा और नए कौशल भी वह अर्जित करता चलता है। उसकी यह सुनम्यता अद्भुत होती है और उसकी कोई सीमा नहीं होती। स्कूल की संस्था समाज की आवश्यकता के अनुसार कुछ चुने हुए ज्ञान और कौशल को पाने का एजेंडा तय करती है। वह व्यक्ति को अनुशासन में रख कर एक सामान्य प्रौढ़ जीवन के लिए तैयार करती है। भारत में ‘‘तथागत’ नामक प्रतिभाशाली किशोर और हाल ही में अमेरिका में किसी भारतीय मूल के एक किशोर को 18 साल में मेडिकल की पढाई पूरी करने की बात हो रही है। कैलीफोर्निया विविद्यालय द्वारा यह छूट दी जा रही है। पढ़ाई कब शुरू हो और कब कौन परीक्षा किस आयु में दे सकता है यह सब तयशुदा है।
लोग बुद्धि और कुशलता में अलग-अलग तरह के होते हैं। किंतु स्कूल उन्हें एक मान लेता है और उसी खांचे में फिट करता है। शायद यही कारण है कि विश्व के अनेक प्रख्यात विद्वान, लेखक और वैज्ञानिक स्कूली जीवन में असफल रहे थे। स्कूल का लक्ष्य क्या हो और स्कूल किनके लिए हो यह एक कठिन प्रश्न हो गया है। स्कूल क्या करे इस सवाल का उत्तर पाने के लिए यह जानना जरूरी है कि स्कूल की दहलीज पर पहुंच रहा मानस कैसा होता है। 
यह सवाल हार्वड के प्रख्यात शिक्षाविद होवार्ड गार्डनर ने ‘‘दि अनस्कूल्ड माइंड’ नामक पुस्तक में उठाया था। गार्डनर इस बात की वकालत करते रहे हैं कि बुद्धि के अनेक आयाम हैं। वह बुद्धि की बहुलता में विास करते हैं। कोई नृत्य में तो कोई बांसुरी बजाने में, तो कोई विज्ञान, तो कोई वास्तुविद्या की योग्यता रख सकता है। कोई सामाजिक बुद्धि की दृष्टि से भी श्रेष्ठ हो सकता है। योग्यता के अनेक रूप होते हैं। इस बात के प्रमाण हम जिंदगी में हमेशा पाते रहते हैं। स्कूल का दायित्व बनता है कि वह बुद्धि की एकांगी दृष्टि से बचें और इन भिन्न प्रकार की मानस शक्तियों को विकसित करने का अवसर प्रदान करे। एकांगी हो कर वे कुपढ़ ही होंगे और उनसे तो अपढ़ ही भले।
लेखक
गिरीश्वर मिश्र

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