स्मार्टफोन के शिक्षक बन जाने के बाद

मोबाइल फोन से सीखा गया ज्ञान अगर रोजगार न दिला सका, तो वह निरर्थक रह जाएगा।

डिजिटल इंडिया की मुहिम अब शिक्षा के क्षेत्र में पहुंच रही है। अभी कुछ समय पहले मानव संसाधन मंत्री, स्मृति ईरानी ने मोबाइल एप और वेबसाइट के जरिये ई-पाठशाला की शुरुआत की थी। वह इसलिए कि शिक्षक-अभिभावक छात्रों की उपस्थिति और उनकी प्रगति को देख सकें। सीबीएसई स्कूलों में ‘सारांश’ नाम से एक और योजना शुरू की गई, जिसमें बच्चों की विषयवार पढ़ाई व तुलनात्मक परिणाम देखने का प्रबंध किया गया है। साथ ही ‘शाला सिद्धि’ और ‘शाला दर्पण’ नाम की योजनाएं भी हैं, जिनमें बच्चों की हाजिरी, उनका टाइम टेबल और उनकी मार्कशीट देखी जा सकती है। लेकिन इन सब योजनाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण ‘स्वयं’ नाम का एप है, जिसके जरिये ई-लर्निग को बढ़ावा दिया जाएगा। दावा किया गया है कि इसमें दस भाषाओं में 500 से भी अधिक कोर्स उपलब्ध होंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि ये पाठ्यक्रम नि:शुल्क उपलब्ध होंगे।

जाहिर है, मोबाइल फोन अब भारत में भी ई-शिक्षक की भूमिका में आने को तैयार है। लेकिन सच यह भी है कि अभी हम मानव विकास के कई सूचकांकों में काफी पीछे चल रहे हैं। खुद शिक्षा मंत्री ही स्वीकार चुकी हैं कि देश की बुनियादी, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम बहुत कमजोर हैं। इनसे जुड़ी तमाम रिपोर्टे बता रहीं हैं कि इन पाठ्यक्रमों में शिक्षक-छात्र संवाद टूटने के कगार पर है। देश की शिक्षा धीरे-धीरे मूल्यों व संस्कारों से दूर छिटक रही है।
 ऐसोचैम की हालिया रिपोर्ट यह बता रही है कि देश में तकनीकी व प्रबंधन शिक्षा की गुणवत्ता के कमजोर होने से डिग्री व रोजगार के बीच फासला और बढ़ रहा है।एक और खास बात यह है कि हमारी स्वदेशी शिक्षा का मानवीय पहलू अब धीरे-धीरे लुप्त होकर छात्र-छात्रओं को अधिक आक्रामक और बेलगाम बना रहा है। देश में 21वीं सदी की सूचना क्रांति और ज्ञानाश्रित समाज का यह एक अलग चेहरा है, जिसमें मोबाइल के जरिये आज के युवाओं को बाजारोन्मुख सूचनाओं और आक्रामक उपभोग से सीधे साक्षात्कार कराने की होड़ लगी है। दूसरी ओर, अभावग्रस्त लोग अशिक्षित जीवन जीने को भी मजबूर हैं। जरूरी यह है कि इस अभावग्रस्त वर्ग के युवाओं को उस स्तर पर लाया जाए, जहां वे डिजिटल इंडिया की शिक्षा क्रांति का लाभ उठाने की स्थिति में आ सकें। इसके लिए इन युवाओं के उन्नयन के विशेष प्रयास तो करने ही होंगे, मानव विकास सूचकांक के पैमाने पर इस पूरे वर्ग के जीवन की गुणवत्ता भी बढ़ानी होगी। एक शिक्षक के रूप में मोबाइल एप पाठ्यक्रम चलाकर ज्ञान को विस्तार देने का काम करेगा। लेकिन इसके आगे कौशल विकास भी बहुत जरूरी है, क्योंकि मोबाइल से सीखा गया ज्ञान अगर वास्तविक जीवन में काम न आ सका और युवाओं को रोजगार नहीं दिला सका, तो वह न सिर्फ निरर्थक होगा, बल्कि बहुत-सी समस्याएं भी पैदा करेगा।

लेखक
विशेष गुप्ता
प्राध्यापक समाजशास्त्र
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


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