बाल श्रम का कलंक


संसद का मानसून सत्र सोमवार से शुरू हो रहा है। वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी, शत्रु संपत्ति, फैक्ट्री संशोधन, बाल श्रम, व्हिसल ब्लोअर समेत कई महत्वपूर्ण विधेयक सदन के सामने लंबित पड़े हैं। इन सभी विधेयकों में राज्यसभा के समक्ष एक महत्वपूर्ण विधेयक के रूप में बाल श्रम कानून में संशोधन की प्रक्रिया लंबित पड़ी है। बाल श्रम का मुद्दा कोई नया विषय नहीं है। सातवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 14 अगस्त 1987 को नेशनल चाइल्ड लेबर पॉलिसी को मंजूरी प्राप्त हो जाने के बाद से यह मुद्दा सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के लिए एक अहम विषय-वस्तु बना रहा है। बाल मजदूरी पूरी दुनिया के लिए एक चिंताजनक विषय है। भारत समेत अन्य विकासशील देशों में भी इस समस्या की जड़ें मजबूत हो चुकी हैं। सच है कि इस दिशा में सरकार ने समय-समय पर कानून बनाए हैं और कुछ हद तक इस पर काबू भी पाया जा सका है। बाल श्रम की समस्या के समाधान में गैर सरकारी संस्थानों का भी बड़ा योगदान रहा है। इस दिशा में हाल ही में नीदरलैंड की राजधानी हेग में बाल श्रम के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम को और मजबूत करने के उद्देश्य से बैठक आयोजित की गई। एक सामाजिक कुरीति को समाप्त करने के प्रयास में कई देशों से आमंत्रित सांसदों की बैठक में इस लेखक को भी हिस्सा लेने का अवसर प्राप्त हुआ। बाल अधिकारों की लड़ाई और उन्हें मुक्त एवं आजाद बचपन प्रदान करने की कोशिश में संघर्षरत नोबेल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की भागीदारी में आयोजित इस महत्वपूर्ण बैठक में सांसदों को इसलिए आमंत्रित किया गया ताकि वे इस मुद्दे पर अपने-अपने क्षेत्र में काम करें, साथ ही बाल श्रम पर पूर्ण पाबंदी के लिए सरकारी तंत्र को भी सजीव कर सकें।  विश्व श्रम संगठन के अनुसार आज भी विश्व में लगभग 16 करोड़ अस्सी लाख बच्चे बाल श्रमिक की जिंदगी जीने को मजबूर हैं। इनमें से आठ करोड़ पचास लाख बच्चे खतरनाक प्रवृति के कामों में संलिप्त हैं। हालांकि इस संख्या में कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2000 में कुल बाल श्रमिकों की संख्या 24 करोड़ 60 लाख और खतरनाक कार्यो में शामिल बच्चों की संख्या 17 करोड़ 10 लाख थी। दुर्भाग्यपूर्ण है कि एशिया और प्रशांत देशों में आज भी सर्वाधिक बाल श्रम का इस्तेमाल किया जा रहा है। इन देशों में बाल श्रमिकों की संख्या लगभग सात करोड़ 80 लाख के करीब है। सब सहारन अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, कैरेबियन देशों, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के राष्ट्रों में भी बाल श्रम की समस्या एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। अपने देश में भी बाल श्रमिकों की तादाद कम नहीं है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक 11 में से एक बच्चा बाल श्रमिक है। इनकी संख्या में कमी की गति निराशाजनक है। कुल बाल श्रमिकों की संख्या की लगभग आधी तादाद मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में है। देश के संविधान निर्माताओं ने बाल मजदूरी पर प्रतिबंध का प्रावधान रखा था। फिर भी 1986 तक भारत के भविष्य के साथ खिलवाड़ होता रहा। 36 साल बाद बने उस बाल श्रम कानून में कई खामियां समाहित हैं। विगत में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा बाल श्रम कानून को नरम करने के संशोधनों के खिलाफ विभिन्न मजदूर संगठनों द्वारा विरोध दर्ज भी किया जा चुका है। इस संशोधन के तहत 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घरेलू या पारिवारिक उपक्रमों में काम किए जाने की अनुमति का प्रावधान है। ऐसा कोई भी कानून जो बच्चों को उनके खाने-खेलने, पढ़ने-लिखने और आजाद बचपन के अधिकारों से वंचित करने वाला हो, न्यायोचित नहीं होगा। 

पारिवारिक व्यवसाय या घरेलू उपक्रमों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम करने की अनुमति पर संबंधित संसदीय स्थाई समिति की रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है कि ऐसा कानून दोषपूर्ण हो सकता है। सरकार या मंत्रालय द्वारा इस बात का पता लगाना मुश्किल हो जाएगा कि बच्चा पारिवारिक काम-धंधे में हाथ बंटा रहा है या वह अपने परिवार की आमदनी सुनिश्चित कर रहा है। दूसरा पक्ष यह भी है कि बच्चा अपनी इच्छा से पारिवारिक कार्यो में हाथ बंटा रहा है या उस पर किसी तरह का दबाव है। समिति ने यह भी सवाल खड़ा किया कि स्कूल से लौटने के बाद बच्चे यदि काम में लग जाएंगे तब वे खेलेंगे कब? बच्चों के संपूर्ण मानसिक और शारीरिक विकास के लिए खेलकूद भी शिक्षा के समान ही महत्वपूर्ण है। एक और तथ्य है कि बच्चे यदि छह या सात घंटे काम करने लगेंगे तो फिर वे पढ़ेंगे कब? ऐसे में शिक्षा के स्तर में भी गिरावट आना स्वाभाविक है। शिक्षा के अधिकार का हनन किसी भी सूरत में नुकसानदायक ही होगा। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा पारित कनवेंशन इस तथ्य पर बल देता है कि बच्चों को किसी भी तरह के श्रम में शामिल किए जाने की उम्र उनकी स्कूली शिक्षा समाप्त करने की उम्र से कम नहीं होनी चाहिए। इस उम्र में बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास होता है, जबकि काम के दौरान उन्हें शोषण का शिकार होना पड़ता है। 

बच्चों को लेकर हाल ही में प्रकाशित आंकड़े भयभीत करने वाले हैं। देश में प्रतिघंटे 15 से 20 बच्चे गायब हो जाते हैं। बाल ट्रैफिकिंग की शिकायतें बढ़ी हैं। समय की मांग है कि सरकारी, गैर सरकारी समेत संपूर्ण सामाजिक संस्थाएं एकजुट होकर बाल श्रम के कलंक का सामना करें। बच्चों को बाल श्रम से मुक्त करने और उचित पुनर्वास सुनिश्चित कराने में सख्त कानून की आवश्यकता है। आजादी के बाद से अब तक इस दिशा में काम हुए हैं, परंतु गति धीमी रही है। चूंकि बच्चे समाज और देश के भविष्य होते हैं, लिहाजा राजनीतिक दलों, स्वयंसेवी संस्थाओं, गैर सरकारी संगठनों को बिना किसी भेदभाव और तत्परता के साथ काम करने की जरूरत है। देश के सामाजिक न्याय और श्रम मंत्रलय, विश्व श्रम संगठन और यूनिसेफ जैसी अन्य संस्थाओं के प्रयासों को और मजबूत करने के लिए जरूरी है कि प्रत्येक नागरिक या प्रतिनिधि अपने स्तर से इस सामाजिक कुकृत्य का अंत करने में अपनी भूमिका अदा करे। आगामी मानसून सत्र में संसद के समक्ष भी यह चुनौती है कि बाल श्रम कानूनों को कितनी गंभीरता से लिया जाता है। भारतीय राजनीतिक संदर्भ में यह एक अग्निपरीक्षा होगी।

लेखक 
केसी त्यागी
(लेखक जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सदस्य हैं)



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