बचपन छीनती आधुनिक शिक्षा

आजकल ज्यादातर अभिभावक अपने बच्चों के भविष्य को लेकर परेशान हैं, बच्चे के जन्म से ही उसके डॉक्टर या इंजीनियर बनाने की चाह माता पिता को सदैव उसके लिए बेहतर और सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्रबंधन के लिए प्रेरित और चिंतित करती है और यह चिंता उसके बच्चे को 3 वर्ष भी अपना बचपन नहीं जीने देती है। दादी दादा की कहानियों से इतर उसे प्रतिपल पोयम और ए बी सी डी का ज्ञान केवल इसलिए दिया जाता है क्योंकि उसे अपने शहर के किसी प्रतिष्ठित कान्वेंट की प्रवेश परीक्षा पास करनी है। एल के जी , यू के जी और नर्सरी के बाद कक्षा एक तक पहुँचते पहुँचते बच्चे का बचपन और बचपना दोनों ख़त्म हो चुके होते हैं। आलम यह है कि हमारे शहर के नामी क्रिश्चियन स्कूल में कक्षा 1 के छात्र को 20 देशों के फ्लैग और उनकी कैपिटल याद करवाने में अभिभावकों को पसीना आ रहा है पर फिर भी सुखद भविष्य की चाह में कोई भी मैदान छोड़कर भागना नहीं चाहता है।
        अगर आप वर्तमान में किसी छात्र की दिनचर्या देखें तो सुबह 7 बजे के स्कूल में 6 बजे ही आपका बच्चा बस में सवार होकर स्कूल निकल जाता है और  बमुश्किल 2 बजे घर बापस आ पाता है वह अपने शरीर का पसीना सुखा पाये उससे पहले ही उसका होमवर्क कराने के लिए ट्यूटर घर आ चुके होते हैं।स्कूल होमवर्क और ट्यूटर के वर्क के बाद बचे एक दो घंटे  में बच्चों द्वारा देखे गए टीवी के कार्टून कार्यक्रम वाले समय को ही हम उनका बचपन मान सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि 6 वर्ष से पहले किसी भी बच्चे को स्कूल में प्रवेशित ना किया जाए और ना ही उसके हाँथ में कलम दी जाए। पर जीवन की प्रतिस्पर्धा में श्रेष्ठ बनाने की चाह में कोई भी अभिभावक इस सलाह को मानने को तैयार नहीं है।और इसका सीधा प्रभाव बच्चे के सीखने की क्षमता और उसके स्वास्थ्य पर पड़ता है।
      आपने शायद ही कभी गौर किया हो कि वास्तव में इतनी कठिन और अनुशासित पढ़ाई में बच्चे ने क्या सीखा और उसे क्या याद रहा। ज्यादातर अभिभावक यह स्वीकार करते हैं कि उनका बेटा नर्सरी में याद करायी गयी पोयम कक्षा 3 तक भूल चुका था। अभिभावकों से बात करने पर यह तथ्य भी पता चलता है कि छात्र किसी वर्ष में याद किये ज्यादातर प्रश्न अगले वर्ष में 2nd सेमेस्टर तक भूल चुके हैं। लगभग 15 वर्ष पहले यूपी बोर्ड में कक्षा 11 और 12 का पाठ्यक्रम कक्षा 12 की वार्षिक परीक्षा के प्रश्नपत्र में आता था और छात्र को कक्षा 12 में कक्षा 11 का पढ़ा भी याद रखना पड़ता था। जबकि सीबीएसई बोर्ड में केवल कक्षा 12 का ही सिलेबस याद रखना होता था ,उस समय यूपी बोर्ड देश के सबसे कठिन बोर्ड में था।छात्रो की समस्या को देखते हुए पाठ्यक्रम को कई हिस्सों में प्रथक कर दिया गया और हर परीक्षा में केवल कुछ अंश ही अब परीक्षा में याद रखना होता है इसका फायदा यह हुआ कि छात्र अब तनावमुक्त होने के साथ परीक्षा में ज्यादा स्कोर करने लगे।अब यहाँ प्रश्न यह उठता है कि जो पढ़ाई छात्र 6 माह में भूल जाते हैं वह आगे जीवन में कितनी उपयोगी होगी। पर इस भूली जाने बाली पढ़ाई के लिए बच्चों का मानसिक दोहन कितना उचित है।
     वर्तमान में ज्यादातर अच्छे कान्वेंट की फीस 3 हजार रूपये प्रतिमाह से शुरू है और डीपीएस जैसे प्रतिष्टित स्कूल एक वर्ष में 1लाख तक शुल्क बसूल रहे हैं। बाबजूद इसके छात्र को होमवर्क पूरा करवाने और प्रतियोगी परीक्षा में बनाये रखने के लिए निजी ट्यूटर का ही सहारा लेना पड़ता है। 1 लाख फीस लेने के बाद भी क्या विद्यालय बच्चे को शिक्षित नहीं कर पा रहा है। क्यों इन विद्यालय के बच्चों को भी भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए अंततः कोचिंग सेंटर का ही सहारा लेना पड़ता है। अगर बच्चे का भविष्य ट्यूटर और कोचिंग सेंटर ही तय करते हैं तो बच्चे के बहुमूल्य 6-8 घंटे इन महँगे विद्यालय में बर्बाद करने का क्या फायदा।
      वास्तव में आज का अभिभावक शिक्षा का अर्थ ही नहीं समझ सका। ज्यादातर लोगों की नजर में बच्चे के होशियार होने का पैमाना उसके द्वारा सुनायी  गयी पोएम, अंग्रेजी में बातचीत और उसकी अंकतालिका पर दर्ज़ A+ और स्टार हैं। अभिभावकों की नजर में बच्चे के सम्पूर्ण विकास की जगह केवल अंकतालिका पर दर्ज़ प्रतिशत ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, भले ही इन प्रतिशत को हाँसिल करने में बच्चे का मानसिक ,शारीरिक और बौद्धिक विकास अवरुद्ध हो रहा हो। पढ़ाई के बोझ और प्रतियोगी परीक्षा में सफलता का दबाब छात्रों को कई बीमारियों से ग्रसित कर रहा है।
 अधिकांश छात्रों को दृष्टि दोष की शिकायत है। दिनचर्या अस्त व्यस्त होने से बच्चे एनीमिया के शिकार हो रहे है। अभिभावक अपने बच्चों में सिरदर्द और चिड़चिड़ेपन के शिकायत को लेकर परेशान हैं। छात्रो में याद की गयी विषयवस्तु को भूलने की शिकायतें आ रही हैं।
    एन सी ई आर टी नई दिल्ली को भारत में संतुलित पाठ्यक्रम के विकास का दायित्व सौपा गया है। एन सी ई आर टी के अधीन संचालित केंद्रीय विद्यालयों में कक्षा 1 से ही प्रवेश मिलता है और इससे पहले छात्र यदि कही भी नहीं पढ़ा है तो भी उन्हें प्रवेश देनें में कोई एतराज़ नहीं है यहाँ कक्षा 1 से 5 तक गतिविधि आधारित शिक्षा को प्राथमिकता है गृहकार्य के रूप में प्रारंभिक कक्षाओं में सप्ताह में 1 घंटे का प्रोजेक्ट वर्क ही दिया जाता है जिसमे बाजार से कुछ ना खरीदना पड़े। किताबों में पाठ्यक्रम संतुलित है छात्रों को वर्ष भर खेलकूद और गतिविधि करायी जाती है। क्लास स्तर से हाउस स्तर और विद्यालय स्तर तक प्रतियोगिता के अवसर मिलते हैं और प्रत्येक छात्र को किसी ना किसी गतिविधि में भाग लेने और विजयी होने का अवसर मिलता है जिससे प्रतिभाशाली छात्र क्लस्टर लेवल से नेशनल तक पहुँचते है। एन सी ई आर टी यही पाठ्यक्रम और शिक्षण विधि समस्त सी बी एस ई मान्यता प्राप्त विद्यालयों में लागू करने की बाध्यता देता है पर कोई भी नामी कान्वेंट इसको अपनाने में रूचि नहीं लेता। आपको यह भी जानकर आश्चर्य होगा कि केंद्रीय विद्यालय कक्षा 1 में बिना किसी परीक्षा के सीधे प्रवेश लेते है जिसमे 10 प्रतिशत ऐसा वंचित वर्ग भी होता है जिसका पढ़ाई से पूर्व में कोई वास्ता नहीं होता है वाबजूद इसके केंद्रीय विद्यालय का सफलता प्रतिशत महँगे कान्वेंट से कही ज्यादा होता है और इसका एक मात्र कारण एन सी ई आर टी के दिशा निर्देशो का अनुपालन और बच्चों को उनकी आयु वर्ग के हिसाब से शिक्षा देना है।
    राज्य और केंद्र किसी भी विद्यालय को मान्यता प्रदान करते समय यह बाध्यता रखते हैं कि विद्यालय सरकार द्वारा निर्धारित दिशा निर्देशों के अनुक्रम में ही संचालित होगा और विद्यालय इस पर लिखित सहमति देता है बाबजूद इसके कोई भी मान्यता प्राप्त और सहायता प्राप्त विद्यालय कभी भी इसका पालन करता नहीं दिखाई देता है जिसका खामियाजा अंततः वहां अध्यनरत छात्रों को ही भुगतना पड़ता है कई शिकायतों के बाबजूद आज तक कभी भी इन विद्यालयों को सरकार द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप संचालित करवाने में शिक्षा विभाग सफल नहीं हो सका।
   शिक्षा के बाजारीकरण के लिए अभिभावक ही दोषी है बाजार में वही बिकता है जिसकी मांग होती है अभिभावक अब अपने बच्चों के लिए वातानुकूलित कमरों और वातानुकूलित बसों की चाह रखता है सबसे महँगे विद्यालय में छात्र का प्रवेश उसके  सामाजिक हैसियत प्रदान से जुड़ा मुद्दा है इसीलिए हमारी शिक्षा व्यवस्था प्राचीन गुरुकुल से चलती हुयी पांच सितारा वातानुकूलित आलीशान विद्यालयों में पहुँच चुकी है जहाँ छात्र को पढ़ाई के साथ सभी ऐशोआराम उपलब्ध कराने की लिखित गारंटी मिलती है।  वास्तव् में शिक्षा वह हो जो छात्र का सम्पूर्ण विकास कर उसे देश के लिए एक सुयोग्य नागरिक के रूप में तैयार करे पर वर्तमान दशा में शिक्षा अपना यह उद्देश्य पूरा करती नहीं दिख रही है।




अवनीन्द्र सिंह जादौन
महामंत्री, 
टीचर्स क्लब उत्तर प्रदेश
278, कृष्णापुरम कॉलोनी इटावा
उत्तर प्रदेश 

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