1 अप्रैल,2010 से लागू शिक्षा के अधिकार अधिनियम(RTE) के बहाने ही सही पर निजी स्कूलों के वास्तविक चरित्र जो कि व्यवसाय के इर्द गिर्द ही पनपता है,अनेकों बार उजागर हुआ हैं। माननीय सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बावजूद भी दुर्बल वर्ग के बच्चों को यह अपनी दहलीज़ पर कदम रखने में आनाकानी कर रहें हैं। RTE के तहत इन्हें अपनी निर्धारित सीटों के 25% पर दुर्बल वर्ग के बच्चों को प्रवेश देना है। 31 मार्च, 2013 तक सभी स्कूलों को कई ढांचागत जरूरतें तथा अन्य मानक व शर्तें पूरी करनी थीं। व्यवस्था भी इन्हें अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का एहसास कराने में बेबस नज़र आ रही हैं। राजधानी का आंकड़ा ही अचम्भित करने वाला है जिसमें निर्धारित 25000 सीटों में मात्र 3400 आवेदन आये,2500 पात्र पाये गए और उसमें भी मात्र 1500 को प्रवेश मिल पाया है।अभिभावकों की हैसियत देखकर अपने विद्यालय के दरवाजे खोलने की सोच रखने वाले यह स्कूल नयी-नयी तरकीबों से शिक्षा को बेचते नज़र आते हैं।अच्छी शिक्षा के नाम पर अभिभावकों का शोषण करने वाले सामाजिक सरोकारों से भागते नज़र आ रहे हैं। अकसर नये सरचार्जों के साथ सामने आते हैं। विद्याज्ञान जैसी संस्थाएं अवश्य ही दुर्बल वर्ग के लिए आशा की किरण हैं।इस विषय के साथ उन लोगों की आँखें खोलना भी आवश्यक है जो सरकारी शिक्षकों को निरन्तर कठघरे में खड़ा कर अपनी हताशा निकालते रहते हैं।

यह निजी स्कूल जिन बच्चों को अपनी चौखट में कदम नहीं रखने देते,सरकारी शिक्षक उन दुर्बल वर्ग के बच्चों की चौखटों पर जाकर उन्हें अपने विद्यालय में लाकर, उनके लिए दिन-रात खपते हैं।सरकारी शिक्षक गैर शैक्षणिक कार्यों के बोझ तले दुर्गम क्षेत्रों में अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए संघर्षरत हैं जबकि निजी स्कूलों को ऐसी परिस्थितियों से सामना नहीं करना पड़ता और न ही वे दुर्गम क्षेत्रों की ओर अपना विस्तार करते हैं। नामी निजी स्कूल उन बच्चों को दोयम दर्जें का अहसास करा किनारे लगा देते हैं जो किन्हीं कारणों से अपनी कक्षा में कमतर रह गए हैं। वे इन्हें अपने स्कूल में रखते हुए, दूसरे स्कूल से  फार्म भरवाते हैं ताकि बदनामी इनके हिस्से न आये और मोटी-मोटी फीस से झोली भी भरती रहे। इसके विपरीत उच्च शिक्षा एवं नई सोच से लैस नवनियुक्त सरकारी शिक्षक लगातार बच्चों और समाज के मध्य सभी प्रकार के भेद मिटाने में तत्पर हैं। ऐसी स्थिति के बावजूद भी कुछ लोग जमीनी हकीकत को नज़रअंदाज कर सरकारी शिक्षकों की  इनके साथ गैरबराबरी की तुलना कर नीचा दिखाने में लगे हैं। ऐसे लोगों को यदि वास्तविक रूप से दुर्बल वर्ग के बच्चों की चिंता होती तो वे सामाजिक दायित्वों से मुँह मोड़ने वाले इन निजी स्कूलों के इस रुख के खिलाफ सड़कों पर नज़र आते। 

अत: ऐसे हताश और जलनशील लोगों को अनदेखा कर अपने कर्तव्यों का यथासंभव सफलतापूर्वक निर्वहन करते रहिये। इसके अतिरिक्त दुर्बल वर्ग के इन बच्चों के हितों एवं अधिकारों की रक्षा के लिए निजी स्कूलों की इस सोच के खिलाफ मोर्चा भी लीजिए। शिक्षक होने के नाते इनके अधिकारों का संरक्षण करना आपका प्रथम कर्तव्य है। नीति निर्माताओं को भी इस ओर गहनता से विचार करना होगा कि किस तरह शिक्षा के क्षेत्र को बाजारु होने से बचाया जाए और धनलोलुप सोच से ग्रसित लोगों को इस पवित्र एवं सामाजिक सरोकार के पेशे से भगाया जाएं।
लेखक
राहुल प्रताप सिंह, प्र०अ०,
प्रा०वि०-शंकरपुर
जनपद-सीतापुर।
            

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