आज अगर किसी से भी भारतीय शिक्षा व्यवस्था की बात की जाए तो सब यही कहेंगे कि शिक्षा एक व्यवसाय बन गया है, एक बाजार बन गया है, जिससे सभी लोग परेशान हैं। लेकिन क्या सच में ऐसा है, अगर इस बात में सच्चाई होती तो क्या भारतीय शिक्षा व्यवस्था की इतनी दुर्दशा होती, इतनी खामियां और नाकामियां होतीं। शायद नहीं, क्योंकि बाजार या व्यवसाय की एक नैतिकता है, जिसका आधार प्रतिस्पर्धा, ग्राहक संतुष्टि है, लेकिन ये दोनों ही मूलभूत तत्व इस व्यवस्था से नदारद हैं। 

शिक्षा का अधिकार कानून आए एक अरसा बीत गया है, जितनी उम्मीद लोगों और सरकार की इससे थी, उतनी फलीभूत नहीं हुई। पहले से ही कंडम शिक्षा व्यवस्था का इसने और कबाड़ा किया है, जिसके अनेक पहलू हैं। आज बात इसी से जुड़े एक पहलू पर है, जिसपर ध्यान बहुत कम लोगों गया है और जिनका ध्यान गया है, वो भुक्तभोगी बनकर सामने आया है, जिसकी कोई सुनवाई नहीं है। 

 उदाहरण के लिए बात दिल्ली की करूंगा, क्योंकि ये देश की राजधानी है और अगर इसका दुष्प्रभाव यहां पर ऐसा है तो देश के अन्य भूभाग की तुलना आप स्वयं कर सकते हैं। शिक्षा का अधिकार कानून 14 वर्ष तक के बच्चे की शिक्षा की गारंटी देता है। इसमें वो पब्लिक स्कूल भी है, जहां की फीस बहुत ज्यादा है, वहां भी पचीस फीसदी कोटा कम आय के वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित है। जिसकी फीस का एक बड़ा हिस्सा राज्य सरकार वहन करती है और स्कूल मजबूर हैं कानून के आगे उन्हें एडमिशन देने के लिए। एक आम आदमी के तौर पर देखें तो सरकार की कहीं भी बुरी मंशा नहीं दिखती। लेकिन सिस्टम की नीतिगत खामियों से जब पाला पड़ता है, तब इसकी जमीनी हकीकत बयां होती है। काव्य दिल्ली के एक नामी-गिरामी स्कूल में पढ़ती थी, उसके पिता तिपहिया चालक हैं और शिक्षा के अधिकार कानून के तहत कम आय वर्ग के लिए आरक्षित सीट पर नामांकित होने में कामयाब भी रही, लेकिन मार्च में कक्षा में अव्वल आने पर उसके माता-पिता फूले नहीं समा रहे थे, लेकिन महज 10 दिन बाद उसकी किस्मत में सिवाय रोने के कुछ नहीं था और उसके माता-पिता भी आरटीई की नाकामी के आगे बेबस थे, अब वो दिल्ली के ही एक सरकारी स्कूल में जाती है। सोचिए, कल तक टाई, बेल्ट, खूबसूरत यूनिफार्म में किसी वातानुकूलित कक्षा में बैठने वाली काव्य आज सरकारी स्कूल में जाने को विवश थी। वो 5 या 6 साल उसके जिंदगी के सुंदर अतीत का हिस्सा बन चुके थे और अब बेमन से नए सहपाठियों के साथ पढ़ने को मजबूर थी। आखिर क्यों आरटीई ने उसको मंझधार में छोड़ दिया। इतना ही नहीं, इसकी वजह से स्कूलों में ड्रॉपआउट बढ़ा है। इसकी बहुत बड़ी और अहम वजह है, जिसपर ध्यान अब तक दिल्ली सरकार या केंद्र का नहीं गया, अन्य राज्यों में भी ये हालात होंगे, लेकिन आंकड़े फिलहाल दिल्ली के ही हैं। 2014-15 के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में प्राइमरी सरकारी स्कूल 1757 हैं, जबकि प्राइवेट स्कूल 1019 हैं यानी नर्सरी से पांचवीं तक। अब प्राइमरी से कक्षा 8 तक सरकारी स्कूल सिर्फ पांच हैं, जबकि निजी 878 हैं। थोड़ा और आगे बढ़ने पर पता चलता है कि प्राथमिक से उच्च विद्यालय सरकारी 473, जबकि निजी 647 है। अब आरटीई कहता है कि आपका कम आय वर्ग में प्रवेश नर्सरी से होगा। 1019 प्राइवेट स्कूलों में माना 100 छात्रों के हिसाब से एक लाख बच्चों ने दाखिला लिया, जिसमें से पच्चीस हजार गरीब छात्र हैं, जिसकी न्यूनतम फीस सरकार देती है। अभी दिल्ली सरकार का प्रत्येक बच्चे पर औसत खर्च लगभग 1700 रुपए है, ये औसत खर्च उन तमाम बच्चों पर है, जो दिल्ली में रहते हैं, भले ही आपका बच्चा प्राइवेट स्कूल में भारी-भरकम फीस दे पाने में सक्षम है। इसके अलावा स्टेशनरी और वर्दी का खर्च अलग से है। अब ये पच्चीस हजार बच्चे जब प्राथमिक स्कूल का पड़ाव पर करने के बाद माध्यमिक या उच्च माध्यमिक निजी स्कूलों का रुख करते हैं तो उनके सामने 878 माध्यमिक और 647 उच्च माध्यमिक प्राइवेट स्कूल का विकल्प है, जहां पहले से विद्यार्थी हैं और 75 हजार वो विद्यार्थी भी हैं, जो पूरी फीस भर पाने में सक्षम हैं। ऐसे में इन पच्चीस हजार विद्यार्थियों के साथ अनजाने में हुए छल की बात सामने आती है, पहली बात इनको ये स्कूल कम आय वर्ग में दाखिला नहीं देंगे, दूसरी बात इन स्कूलों में पूरी फीस जैसे-तैसे देकर भी दाखिला लेना कड़ी चुनौती का काम होगा। ऐसे में एक ही सुरक्षित विकल्प बचता है, नर्सरी से पांचवीं तक के पांच स्कूल या नर्सरी से उच्च माध्यमिक के 473 स्कूल यानी इनकी संख्या भी नाकाफी है। दिल्ली के ग्रामीण इलाकों में ये आंकड़े और भी खराब हैं। 2014-15 में कुल दो लाख 37 हजार बच्चों ने निजी प्राइमरी स्कूल में दाखिला लिया, जबकि सरकारी में 10 लाख बच्चे गए। बच्चों के भविष्य से होने वाले इस खिलवाड़ के लिए जिम्मेदार कौन है। दरअसल, आरटीई में ऐसे कई प्रावधान हैं, जो इन छात्रों के सुरक्षित भविष्य की राह में रोड़ा अटकाए हुए हैं। प्राथमिक स्कूल के लिए महज 200 वर्ग मीटर जमीन चाहिए, जबकि उससे ऊपर माध्यमिक स्कूल 700 वर्ग मीटर जमीन की जरूरत होगी यानी मात्र 3 कक्षाएं बढ़ाने के लिए 500 वर्ग मीटर जमीन अतिरिक्त चाहिए। जो एक असंभव सा कार्य है बजट स्कूलों के लिए जमीन की व्यवस्था करना। दिल्ली में जमीन के भाव आसमान से ऊपर है, जिसके लिए करोड़ो रुपए स्कूल संचालक को खर्च करने पढ़ सकते हैं। दूसरी बात स्कूल नॉन प्रॉफिटेबल ऑर्गनाइजेशन की श्रेणी में आता है, अगर ऐसा है तो जमीन और भवन के लिए पैसा कहां से आएगा। इसके अलावा प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के अनुपात में जो इतना बड़ा अंतर देखने को मिलता है, उसकी वजह क्या है, ये जानना भी जरूरी है। प्राथमिक स्कूलों को मंजूरी नगर निगम से मिलती है, जबकि माध्यमिक स्कूलों को दिल्ली सरकार से संबंधित विभाग से मंजूरी लेनी होती है। यानी दो अलग-अलग विभाग भी इसकी राह में एक बड़ी मुश्किल है। अब सवाल ये उठता है कि इसका हल क्या है। निसा बजट स्कूलों का संगठन है, जो लगातार सरकार के सामने इस तरह की परेशानियों और विसंगतियों को उजागर करता रहा है। निसा के निदेशक अविनाश चंद्रा का सुझाव है कि प्राथमिक स्कूलों को ही माध्यमिक में परिवर्तित किया जाए, लेकिन इसके लिए 600 वर्ग अतिरिक्त जमीन कहां से लाया जाए। एक रास्ता तो ये हो सकता है कि इन स्कूलों में 2 पालियों की व्यवस्था हो सुबह और दोपहर, जो ज्यादा व्यावहारिक नहीं, क्योंकि दोपहर स्कूल ज्यादा लोकप्रिय नहीं हैं और दो पालियों का अतिरिक्त खर्च वहन करना मुश्किल हो सकता है। दूसरा समाधान स्कूल की 4 मंजिल इमारत को 800 वर्गमीटर माना जाए, जो स्कूलों के लिए भी फायदेमंद होगा। इसके अलावा और समाधानों के विकल्प भी हो सकते हैं, लेकिन आरटीई के कड़े मापदंड में कड़े संशोधन की जरूरत है, जिससे कि बच्चों के भविष्य से इस तरह का मजाक न हो सके। शिक्षा का मूलभूत अधिकार सिर्फ कागजी ही नहीं, जमीनी हकीकत भी बन सके।
  
लेखक
सिद्धार्थ झा 
 jha.air,sidharath@gmail.com
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