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देश में 1.05 लाख से ज्यादा स्कूलों में सिर्फ एक अध्यापक है। अध्यापकों के 5.86 लाख पद खाली पड़े हैं। देश के कुल शिक्षकों में से 13 फीसद कांट्रेक्ट पर हैं। इन्हें स्थाई शिक्षकों की तुलना में बेहद मामूली वेतन मिलता है। ये सारे आंकड़ें केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के हैं। इसलिए इनको लेकर किसी तरह के विवाद की कोई गुंजाइश नहीं है। अब आप खुद देख लें कि हमारे देश में शिक्षा व्यवस्था की ताजा स्थिति किस हद तक तक पटरी से उतर चुकी है और हम उन स्कूलों का तो जिक्र ही नहीं कर रहे, जो मान्यता प्राप्त नहीं हैं। इस तरह के स्कूलों में भी लाखों बच्चे पढ़ रहे हैं। इन पर प्रशासन की नजर क्यों नहीं जाती, इस सवाल का उत्तर उन सभी को चाहिए, जो देश में स्कूली शिक्षा की बदहाली को लेकर चिंतित हैं। ये कुछ हफ्ते पहले की ही तो बात है, जब इलाहाबाद में एक जनाब लंबे समय से एक स्कूल चला रहे थे। उन्होंने अपने स्कूल में राष्ट्रगान पर रोक लगा रखी थी। जब वहां के शिक्षकों ने इस मसले को उठाया तो उनकी कलई खुली। उसके बाद प्रशासन भी सक्रिय हो गया। उस गैरमान्यता प्राप्त स्कूल के बच्चों को आसपास के सरकारी स्कूलों में दाखिला दिलवाया गया और जो धूर्त शख्स बच्चों के भविष्य से खेल रहा था, वो अब जेल की हवा खा रहा है।बीती 5 सितंबर को देश ने अध्यापक दिवस मनाया। उस दिन सारा देश अपने गुरुजनों का कृतज्ञता के भाव से स्मरण कर रहा था। लेकिन हममें से कितने लोगों को उपर्युक्त आंकड़ों की जानकारी थी। बेशक, बहुत ही कम। 

जब शिक्षकों का ही समाज सही तरह से ख्याल नहीं कर रहा है तो फिर उनसे किसी भी तरह की अपेक्षा करना बेमानी होगी। उन्हें अपनी कक्षाएं लेने के अलावा जनगणना के वक्त घर-घर जाकर आंकड़े एकत्र करने से लेकर पंचायत से लेकर लोकसभा चुनावों में पोलिंग बूथ पर भी ड्यूटी करनी पड़ती है। उन्हें ही मिड डे मील की व्यवस्था भी देखनी रहती है। यानी पढ़ाने के अतिरिक्त और तमाम दायित्व उनके जिम्मे हैं और जब विद्यालयों में शिक्षक ही नहीं होंगे तो बच्चों को पढ़ाएगा कौन। निर्विवाद रूप से गिरते शिक्षा के स्तर के प्रमुख कारणों में एक शिक्षकों की कमी भी है। आंकडे़ चौंकाने वाले हैं, क्योंकि देश में कहीं-कहीं तो 200 बच्चों पर एक शिक्षक ही तैनात है और कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा विद्यालय ही शिक्षामित्र के सहारे चलता है। देश के दूरदराज के इलाकों की तो बात छोड़िए, देश की राजधनी दिल्ली में करीब एक दर्जन स्कूलों में एक टीचर से काम चल रहा है। ये मजाक नहीं तो और क्या है। 

उत्तर प्रदेश में शिक्षकों के दो लाख पद रिक्त हैं। इन्हें कब भरा जाएगा, कोई नहीं जानता। इस समय देश में 13.62 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं। परंतु इनमें कुल 41 लाख शिक्षक ही तैनात हैं यानी प्रति विद्यालय औसतन तीन शिक्षक। देश में अनुमानित 19.88 करोड़ बच्चे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। प्रतिभाशाली शिक्षकों के अभाव का ही परिणाम है कि कई प्रदेशों के बच्चों के सीखने, पढ़ने व समझने के स्तर में बराबर गिरावट आ रही है। इन विद्यालयों के कक्षा छह तक के बच्चे ठीक से जोड़-घटाव और गुणा-भाग तक नहीं कर पाते हैं।एक बड़ी समस्या ये भी सामने आ रही है कि शहरों-महानगरों के निजी स्कूलों में अध्यापकों की स्थाई नियुक्ति बंद सी हो गई है। उन्हें 4 से 11 महीने के लिए नौकरी मिलती है। उनके ऊपर नौकरी चले जाने की तलवार स्थाई रूप से लटकी रहती है। इन हालातों में आप उनसे निष्ठा की उम्मीद करना छोड़ दीजिए। शिक्षक दिवस पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शिक्षकों के अहम रोल का जिक्र किया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने स्कूल के दिनों के एक मास्टर जी का स्मरण भी किया। यहां तक तो सब ठीक है। पर देश में शिक्षकों को उनका हक दिलवाने का दायित्व सारे समाज का है। वो जिम्मेदारी सिर्फ प्रधानमंत्री को ही नहीं दी जा सकती। अब उत्तर प्रदेश में या किसी अन्य राज्य में शिक्षकों के खाली पद नहीं भरे जा रहे तो इसमें प्रधानमंत्री क्या करेंगे।एक बड़ा मसला और सामने आ रहा है। 

चूंकि अध्यापन के क्षेत्र में किसी तरह का अब कोई आकर्षण नहीं बचा तो इसलिए मेधावी युवा अध्यापन क्षेत्र से दूर होते जा रहे हैं। आप अपने आसपास के किसी मेधावी लड़के या लड़की से मिलिए। वो आपको बताएगा कि उसकी शिक्षक बनने में कतई दिलचस्पी नहीं है। वो बीपीओ में नौकरी कर लेगा, पर शिक्षक नहीं बनेगा। विवाह के बाजार में भी शिक्षक के लिए कोई जगह नहीं है। आप अखबारों में छपने वाले वधू पक्ष के विज्ञापन देखिए। उधर भी कन्या पक्ष शिक्षक को लेकर उदासीन बना हुआ है। यानी शिक्षकों पर चौतरफा मार पड़ रही है। नतीजा ये हो रहा है कि अब बेहद औसत किस्म के लोग अध्यापक बन रहे हैं। जाहिर है, औसत इंटेलिजेंस का इंसान अपने विद्यार्थियों के साथ न्याय तो नहीं कर सकता, वो तो खानापूरी ही करेगा।इन वजहों के कारण देश के अधिकतर स्कूलों में शैक्षणिक गुणवत्ता के स्तर में तेजी से गिरावट हो रही है। 

इनमें कक्षा पांच में पढ़ने वाले छात्रों को जोड़-घटाना तक नहीं आता है। वहीं, कक्षा पांच का छात्र भी कक्षा दो की अंग्रेजी की किताब नहीं पढ़ पाता है। क्या स्कूलों में बच्चे पढ़ने के लिए जाते हैं। इस प्रश्न का उत्तर हां में ही मिलेगा। पर गुस्ताखी माफ ! फिर ये मत कहिए, हम बेहतरीन खिलाड़ी क्यों नहीं निकालते। इस बात को समझ लें कि जब स्कूलों में बच्चों को खेलों की आधारभूत सुविधा ही नहीं मिलेंगी तो वे ओलंपिक खेलों में खाक देश को मेडल दिलवाएंगे। देश के 70 फीसद स्कूलों में तो स्पोर्ट्स टीचर ही नहीं होगा। इतने ही स्कूलों में खेल मैदान भी नहीं होंगे और यदि होंगे भी तो खेतों या चरागाहों से भी बदतर। अब एक सवाल उन शिक्षकों से जो बेहतर पगार पा रहे हैं और जिनकी नौकरी सुरक्षित है। क्या वे बताएंगे कि वे अपने बच्चों को बदलते वक्त के साथ किस तरह से तैयार कर रहे हैं। क्या वे खुद भी अपनी जेब से खर्चा करके पुस्तकें पढ़ते हैं। अफसोस के साथ कहना पड़ेगा कि इस तरह के शिक्षकों का आंकड़ा बेहद कम होगा। जिन शिक्षकों की नौकरी स्थाई हो गई, वे मान कर चलते हैं कि अब उन्हें कोई नहीं निकाल सकता। अब तो वे तब तक सुरक्षित हैं, जब तक वे रिटायर नहीं हो जाते। इसलिए अनेक टीचर अपने काम को लेकर कतई गंभीरता नहीं बरतते और तमाम राज्यों के शिक्षा विभाग अपने अध्यापकों को नियमित ट्रेनिंग भी नहीं देते।10 फीसद शिक्षकों को भी समय-समय पर होने वाली ट्रेनिंग नहीं मिल पाती। अगर उन्हें ट्रेनिंग नहीं मिलेगी तो टीचिंग के क्षेत्र में हो रहे नए-नए बदलावों को लेकर किस तरह से अपने को तैयार करेंगे। हिंदी सूबों में तो स्थितियां बेहद खराब हैं। एक बात को समझ लेना चाहिए कि स्कूली शिक्षा की स्तर में बड़ा सुधार किए बगैर हम संसार में सिर उठा कर नहीं चल सकते और किसी भी क्षेत्र में चाहे वह साहित्य हो या कला-संस्कृति, विज्ञान हो या खेलकूद, विश्व के विकसित देशों के बराबरी में खडे़ होने का सपना भी कैसे देख सकते हैं।

लेखक
आरके सिन्हा
rkishore.sinha@sansad.nic.in




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