ठीक से मिड-डे मील खिलवाना, किताबें- वजीफा बंटवा देना ये विद्यालय प्रमुख की सफलता के पैमाने रह गए हैं।


हाल में राज्यों के शिक्षा मंत्रियों की बैठक में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने सरकारी स्कूलों की स्थिति पर अपना दर्द बयान किया। उन्होंने बताया कि उनकी मां महाराष्ट्र के दूर-दराज के एक गांव में सरकारी स्कूल टीचर थीं। गांव के लोग स्कूल चलाने में काफी सहयोग करते थे। कुछ लोग पानी की व्यवस्था करते, कुछ आकर साफ-सफाई कर जाते, कोई अन्य तरीकों से मदद करता था। लेकिन अब ऐसा नहीं दिखता। मैंने उन्हें कहा कि पहले स्कूल, जनता के होते थे, अब सरकार के हो गए हैं। समाज को स्कूलों से काट दिया गया है, इसीलिए बिल्डिंग्स खराब पड़ी रहती हैं, गंदगी रहती है।

पहले इनमें बहुतेरे काम प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से समाज संभाल लेता था। आज बिल्डिंग सरकार की, जमीन सरकार की। समाज तो छोड़िए, स्कूल अपने प्रिंसिपल का भी नहीं है। इसीलिए आज स्कूलों को सरकार से आजादी चाहिए। तभी  वे समाज खड़ा कर पाएंगे, देश खड़ा कर पाएंगे। शिक्षा का यह बड़ा दर्द है। अच्छी बात यह है कि देश के शिक्षा मंत्री खुद इस दर्द को महसूस कर रहे हैं।
 
प्रयोग से दूर
 
मेरा मकसद स्कूलों को सौ साल पहले के युग में ले जाना नहीं है। लेकिन सरकारी स्कूलों को आजादी तो चाहिए, कैसी और कितनी, इस पर चर्चा की जरूरत है। शिक्षा में अभी तक ज्यादातर बड़े फैसले भारत सरकार के स्तर पर होते हैं। फिर राज्य सरकार या उनके बोर्ड फैसले लेते हैं। मसलन, क्या सिलेबस होगा, क्या शेड्यूल होगा, कब टेस्ट लेना है, कैसे एग्जाम लेना है। एग्जाम पेपर भी ऊपर से सेट होकर आता है।

जो कुछ ऊपर से तय कर दिया जाता है, टीचर्स को उसे ही पढ़ाना होता है। साफ कहें तो उनको ऊपर से तय किया गया कंटेंट किसी तरह से बच्चों के दिमाग में ठूंस भर देना होता है। टीचर्स की खुद की लिबर्टी कुछ नहीं है। हमारा सिस्टम अध्यापकों को कुछ नया करने का मौका नहीं देता। उन्हें एक बंधे-बंधाए सिस्टम में कैद करके बच्चों को पढ़ाने के लिए खड़ा कर दिया जाता है।

नर्सरी से लेकर 12वीं तक किसी भी क्लास की बात कर लीजिए, अध्यापक कुल मिलाकर करिकुलम, डायरी, सिलेबस और पॉलिसी के गुलाम बन गए हैं। उन्हें अधिकार नहीं कि वे बच्चों की पसंद के आधार पर कुछ कंटेंट डिजाइन कर सकें और पढ़ा सकें। यही हाल प्रधानाचार्यों का है। उनके हिस्से में शिक्षा की गुणवत्ता, क्रिएटिव लर्निंग, साइंटिफिक लर्निंग या बच्चों के अलग-अलग आयामों पर प्रयोग करने का काम लगभग नगण्य है। ठीक से मिड-डे मील खिलवाना, यूनिफॉर्म-किताबें-वजीफा बंटवा देना, ये विद्यालय प्रमुख की सफलता के पैमाने रह गए हैं। वहां पढ़ने वाले बच्चों का कितना विकास हुआ, उनकी सोच कितनी बदली, इसकी अपेक्षा न तो सरकारी स्कूलों के प्रधानाचार्य से की जा रही है, न ही उन्हें इसके लिए समय दिया जा रहा है।

दिल्ली में तीन-चार हजार बच्चे जिस बिल्डिंग में पढ़ते हों, उसका रख-रखाव एक फुलटाइम काम है। अभी तक यह जिम्मेदारी भी प्रधानाचार्यों के कंधों पर थी। हमने सभी स्कूलों में एस्टेट मैनेजर की व्यवस्था करके उन्हें इस जिम्मेदारी से आजाद करा दिया है। मैनेजर नियुक्त करने और हटाने का अधिकार भी हमने प्रिंसिपल्स को ही दिया है। बच्चों को टूर पर ले जाने से लेकर उन्हें खेल या गीत-संगीत सिखाने की व्यवस्था अपने हिसाब से करने की आजादी भी प्रधानाचार्य के पास नहीं है। स्कूल में 5-10 हजार रुपये खर्च कर कोई फंक्शन कराने की फाइल भी डिप्टी डायरेक्टर के पास मंजूरी के लिए जाती थी।

सरकार की जिम्मेदारी थी हर बच्चे के लिए शिक्षक की व्यवस्था। अधिकतर सरकारें इसमें भी नाकाम रही हैं। बच्चे दुखी रहते हैं। प्रधानाचार्य से शिकायत करते हैं। हमने प्रधानाचार्य को यह अधिकार दिया कि किसी योग्य व्यक्ति को कुछ महीने के लिए अपने स्कूल में पढ़ाने के लिए रख लें। हमें शिक्षा विभाग का काम तय करना पड़ेगा। 

शिक्षा विभाग शिक्षा देने का काम कर रहा है जबकि शिक्षा देना शिक्षक का काम है। विभाग का काम शिक्षक और प्रधानाचार्य को शिक्षा देने की सुविधाएं उपलब्ध कराना है। लेकिन दुर्भाग्य से शिक्षा मंत्री से लेकर, अफसरों और यहां तक कि स्कूल इंस्पेक्टर्स को भी लगता है कि उनका काम शिक्षा देना है नहीं। इन सबका काम शिक्षा तंत्र को चलाना है। सरकारी तंत्र को अपनी सीमा समझनी होगी।

रही बात समाज को जोड़ने की, तो दिल्ली के सरकारी स्कूलों में एसएमसी (स्कूल मैनेजमेंट कमिटी) की भूमिका इस दिशा में अहम है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के पैरेंट्स को बाकायदा चुनाव के जरिए इसका सदस्य बनाया गया है और ये स्कूल संचालन में बहुत मदद करते हैं। स्कूलों को समाज से जोड़ने की एक  और पहल पैरेंट्स-टीचर मीटिंग रही है, जिसे ऐतिहासिक सफलता मिली है। पहली बार पैरेंट्स को लगा कि ये उनके स्कूल हैं। अब वे बार-बार पीटीएम में आना चाहते हैं और अपने बच्चे की पढ़ाई में पूरा सहयोग देना चाहते हैं। दिल्ली में इन दिनों हर रविवार आयोजित हो रहे रीडिंग मेलों का अनुभव भी यही है।

पहल करे सरकार

शिक्षा और समाज को एक साथ जोड़े बिना शिक्षा क्रांति संभव नहीं है। समाज शिक्षा के साथ जुड़ने के लिए तैयार है। अपने दो साल के शिक्षा मंत्री के अनुभव के आधार पर मैं दावे से कह सकता हूं कि सरकारी स्कूलों के बहुत से प्रधानाचार्यों और शिक्षकों को अगर स्वतंत्र वातावरण मिले तो वे वर्तमान से कई गुना बेहतर काम कर सकते हैं। समाज तैयार है, शिक्षक तैयार है, बस सरकारों की तरफ से पहल की जरूरत है।

लेखक मनीष सिसोदिया 
(लेखक दिल्ली के उप मुख्यमंत्री हैं)



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