शिक्षक संघ शिक्षकों की समस्याएँ उठाने और उनका निस्तारण करवाने के सबसे सशक्त माध्यम हैं। संघे शक्ति कलियुगे का सूत्र वाक्य अपनाने वाले संघों का स्वर्णिम इतिहास रहा है पर संस्कारहीन होते वर्तमान समाज की भाँति संघ भी विचारहीन हो चले हैं। ज्यादातर संघों की स्थायी विचारधारा अपने पद और अस्तित्व की लड़ाई भर रह गयी है और नवनिर्मित संघ अभी स्व की विचारधारा में ही खुश हैं। 
    
पिछले एक दशक में प्रदेश स्तर पर संघो की उपलब्धियों की बात करें तो केवल अध्यक्ष पद को जीत लेने भर के बखान और कुछ आन्दोलन के अलावा उनके पास कुछ भी नजर नहीं आता है। शिक्षक 10 वर्षों से वेतन विसंगति की आस लगाये था तब तक 7 वां वेतन आयोग आ गया। गैर शैक्षणिक कार्य, पेंशन और अन्य गंभीर मुद्दों पर 10 वर्षों से शिक्षक खाली हाथ ही दिखता है। ज्यादातर प्रदेशस्तरीय आन्दोलन के मांगपत्र वर्षों से पूरे नहीं हुए और अधिकतर आन्दोलन बिना किसी परिणाम के समाप्त हो गए। जनपद स्तर से प्रदेश स्तर के शक्ति प्रदर्शन में दूसरे संघो की आलोचना करते हुए स्वयं को श्रेष्ठ प्रदर्शित करने का उद्देश्य ही अब प्रमुखता से नजर आता है। प्रत्येक बार संघों की हुंकार अंततः नए संघों में न जुड़ने के कतार अनुरोध में परिणित होते हुए सरकार को जड़ से उखाड़ फेंकने के वादे के साथ ठंडी पड़ जाती है। संघों के आन्दोलन में जुटी शिक्षकों की भीड़ को देखकर अध्यक्ष के मुख की आत्ममुग्धता और संतुष्टि में शिक्षक हित हमेशा अस्तित्व की लड़ाई लड़ता नजर आता है।

      आजकल संघ और उनके पदाधिकारी एक नयी तरह की रणनीति अपनाते नजर आते हैं। पहले की तरह विद्यालय में अध्यापन कर अपने निजी समय में से शिक्षकों की समस्याओं पर मंथन करने बाले अध्यक्ष अब महंगी लक्जरी गाडियों में विद्यालय समय में ही अधिकारियों के साथ हँसी ठहाके करते नजर आते हैं। पहले की तरह शिक्षकों की समस्यायों से क्रोधित हो बाबू की कॉलर पकड़ लेने वाले अध्यक्ष अब बाबुओं को सिफारशी पर्चियां देकर कान में फुसफुसाते नजर आते हैं। पहले की तरह शिक्षाधिकारियों से सामूहिक समस्या निदान के लिए जिरह करने बाले अध्यक्ष अब समूह विशेष की वकालत करते नजर आते हैं। शिक्षाधिकारियों पर शिक्षक हित का दबाव बनाने की बजाय अब अपने पदाधिकारियों को एनपीआरसी और एबीआरसी जैसे महत्वपूर्ण पदों पर बिठाने और पदोन्नति तथा नियुक्ति में अपने परिचितों को अच्छे स्कूल में पोस्टिंग कराने की रणनीति तय करते नजर आते हैं और ज्यादा लोगों को सेट कर पाने को अपनी बड़ी उपलब्धियों में शामिल कर लोगों को संघ के महत्त्व से परिचित कराकर आत्ममुग्ध भी होते हैं।
    संघ आखिर आजकल इतने विचलित क्यूँ हो रहे हैं संघों को चुनाव किसी दूसरे संघ से नहीं होता है। इसलिए यहाँ वोट बैंक को सँभालकर रखने की कोई जरुरत नहीं है। प्रत्येक संघ अपने लोगों को चुनने के लिए एक विशेष नियमावली बना चुका है। ऐसे में लगातार कई बार एक पद पर चयन में कोई बाधा भी नहीं है। प्रत्येक अध्यापक लगभग सभी संघों का सदस्य होता है ऐसे में संख्या कम होने की भी कोई समस्या नहीं है फिर संघ बेचैन क्यूँ हैं। संघ केवल इसलिए बेचैन हैं क्यूँकि उनका सम्मान लगातार घट रहा है और इसके लिए स्वयं के आंकलन की बजाय शक्ति प्रदर्शन को वरीयता दी जा रही है।
    संघों को इस बात पर मंथन करना चाहिए कि क्यूँ नया अध्यापक हर बार नए संघ की अवधारणा को अपनाता जा रहा है। संघों को यह भी चिंतन करना चाहिए कि क्यूँ अध्यापक अब उन्हें पहले की तरह सम्मान नहीं दे रहा है। संघों को पता करना चाहिए कि किस तरह उनके आस पास इकट्ठी चापलूसों की फ़ौज उन्हें गुमराह कर शिक्षकों के शोषण के लिए माध्यम बनते जा रहे हैं। संघों को यह भी सोचना चाहिए कि आप को अध्यक्ष केवल इसलिए चुना गया है क्यूँकि लोगों को आपके नेतृत्व पर विश्वास था। संघों को यह भी सोचना चाहिए कि आप अपनी बड़ाई स्वयं कर लोगों का सम्मान नहीं पा सकते बल्कि आपके कार्य ही आपके सम्मान का कारण बनेगें। पर संघ आत्ममुग्धता से बाहर आने को तैयार नहीं हैं इसलिए संघ राजनैतिक होते जा रहे हैं और इसका खामियाजा सम्पूर्ण शिक्षा विभाग भुगत रहा हैं।
  संघों के अध्यक्षों को कुर्सी का मोह त्यागते हुए आत्ममुग्धता से बाहर आकर और अपनी चापलूस बटालियन के चक्रव्यूह को तोड़कर पुनः शिक्षक गरिमा और सम्मान के लिए शुरुआत करनी ही होगी अन्यथा संघ हमेशा के लिए इतिहास का हिस्सा बन जायेगें। अध्यक्षों की पल पल पर सेल्फी लेकर स्टेटस अपडेट करने वाले आपके साथी ही कल आपका ऐसा इतिहास लिख देंगे जिसमें आपके कहने के लिए कुछ भी शेष न होगा। 
लेखक
अवनीन्द्र सिंह जादौन
सहायक अध्यापक
महामंत्री टीचर्स क्लब उत्तर प्रदेश
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  1. Mahendra Singh Yadav13 May, 2017 21:03

    अति गहन आकलन व विश्लेषण

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