बेसिक शिक्षा की गरिमा चाहे आज कितनी भी धूमिल क्यो न हो रही हो, किन्तु आज का युवा शिक्षक इस छवि से उबरने का हर बेहतर प्रयास कर रहा है। आजकल बढ़ती गर्मी व खेत खलिहानों के काम में न केवल जन समुदाय व्यस्त है, अपितु बेसिक में पढ़ने वाले छोटे-छोटे नोनिहाल भी। दोनो ही परिस्थिति में नुकसान छात्र संख्या में गिरावट के रूप में विद्यालय का ही है।


 
बच्चो को बुलाने हेतु मास्टरजी प्रथम दृष्ट्या या तो जाते नही और जो जाते भी है वो दर-दर की ठोकरे सी खाते नजर आते है। क्योंकि जिस द्वार पर पहुँचते है, वहाँ अमूमन कुंडी पर ताला लटका मिलता है। नामांकन दर में आई कमी और दूसरी ओर ग्रीष्मकालीन अवकाश से पूर्व विभागीय अधिकारियों के ताबड़तोड़ निरीक्षण....... मानो रही सही कसर तोड़ने के लिए पर्याप्त है।


विद्यालयों में छात्र उपस्थिति कैसे बढ़ाई जाए इसी उधेड़बुन में आज प्रातःकाल मैं अभिभावक सम्पर्क हेतु गांव की ओर निकल पड़ा।  रास्ते मे मेरे गांव में संचालित दो मान्यताप्राप्त विद्यालयो के सामने से गुजरते समय, वहां के दृश्य को देखकर मन मे ढेरो प्रश्न उठे, जिन्होंने मुझे अधिक व्याकुल कर दिया। उक्त दोनों मान्यताप्राप्त स्कूलों में छात्र हमारे बेसिक की ही भांति जमीन पर बैठे थे, किंतु उनके नीचे टाट पट्टी की जगह बच्चो के घर से ही लाई गई बोरिया / प्लास्टिक बैग बिछे थे। विद्यालय भवन के रूप में लोहे की टिन / शीट पड़ी थी, जिनमे चल रहा पंखा गर्मी में उसी टिन की गर्मी को फेंक रहा था।


 उन सभी छात्रों को शिक्षण करा रही शिक्षिका, स्वयं 10 से 12 तक अधिकतम पढ़ाई किये होंगी। एक बालक से पूछने पर पता चला कि यहां 150 से 200 रु मासिक शुल्क लिया जाता है।  यदि भौतिक दशा की बात की जाए तो इन मान्यता प्राप्त विद्यालयों से हमारे बेसिक स्कूल लाखो गुना बेहतर दिखते है, बावजूद इसके दोनो ही विद्यालयों में छात्र संख्या देखते बनती थी। गांव के अन्य सरकारी विद्यालयों को मानो इन छोटी दुकानों ने बन्द कराने का प्रण कर लिया हो। 



मन मे बिजली की तरह प्रश्न उठे....

1. बिना किसी भौतिक सुविधा के भी इनमें ऐसी छात्र संख्या क्यो?

2. अप्रशिक्षित अध्यापको पर हमारे डिग्री धारी प्रशिक्षित शिक्षकों पर अभिभावकों का इतना विश्वास क्यो?

3. हमारी निःशुल्क शिक्षा से क्या उनकी 150 से 200₹ मासिक शिक्षा बेहतर है?

4. यदि भौतिक परिवेश की बात की जाए तो क्या कोई मानक ऐसी दुकानों के लिए नही थे जिनपर इन्हें मान्यता दी गयी?

5. 1000 या 2000 ₹ का शिक्षण करा रहे वो बेरोजगार शिक्षक, क्या 50 से 80 हजार प्राप्त कर रहे अध्यापको से बेहतर है?

6. क्या उनका पाठ्यक्रम हमारे पाठ्यक्रम से बेहतर है जो अभिभावक उनपर अधिक विश्वास करते है, जबकि हम आज नौनिहालों के नामांकन हेतु जूझ रहे है?


कही न कही कोई कमी अवश्य है; अन्यथा लोहे की टिन की तपन से जूझ रहे इन बालको का नामांकन हमारे बेसिक के विद्यालयों में अवश्य होता?

शायद हमें ही स्वयं का अवलोकन करना होगा।  आज सिस्टम को दोष हम शायद नही दे सकते क्योंकि कही न कही हम स्वयं भी इसके दोषी है, एक आम नागरिक की मानसिकता के अनुसार हमारे पास आने वाला बालक मात्र मध्याह्न भोजन को ग्रहण करने आता है, या वो बालक आता है जिनके माता पिता की आय 100 या 150 रु मासिक फीस भरने की नही है...... क्या हमारा स्तर इतना गिर गया है....? 

उफ्फ.... आज  ये मन इतना अशांत और व्याकुल  क्यो हो गया? 




लेखक 
डॉ0 अनुज कुमार राठी 
(कलम का सच्चा सिपाही) 
लेखक जनपद शामली में परिषदीय विद्यालय में प्रधानाध्यापक पद पर कार्यरत है।
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