शिक्षा किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि हम बच्चों को सही शिक्षा दें तभी हम योग्य और कुशल मानव संसाधन का विकास कर सकेंगे। शिक्षा शोध और नवाचार का माहौल बनाने में देश की मदद करती है। शिक्षा देश के नागरिकों के व्यक्तित्व, आचरण और मूल्यों को निखारती है और उन्हें एक विश्व नागरिक बनने में मदद करती है। इसीलिए सभी देश एक निश्चित अंतराल पर शिक्षा में सुधार करने का कठिन प्रयास करते हैं और अपनी शिक्षा नीति की समीक्षा करते हैं। आजादी के बाद से ही हमने इस संबंध में कई बड़े कदम उठाए हैं। सबसे पहले मुदलियार आयोग का गठन हुआ था। उसके बाद कोठारी आयोग बना। 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी थी, जिसे 1992 में संशोधित किया गया था। उसके पच्चीस साल बीते चुके हैं। जाहिर है, आबादी की बदली जरूरतों और शिक्षा, नवाचार तथा शोध के स्तर पर पैदा हुई आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए हमें अपनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। यह एक सतत प्रयास है और इसीलिए हम सभी को एक नई शिक्षा नीति का हिस्सा बनना चाहिए, जो कि आम सहमति और विचार विमर्श से विकसित की जा सकती है। यही वजह है कि सरकार ने इस संबंध में जनवरी 2015 में ही पुनर्विचार प्रक्रिया आरंभ कर दी थी। स्कूली शिक्षा के लिए 13 विषय चयन किए गए थे, जिसमें अध्ययन के परिणाम, माध्यमिक शिक्षा, वोकेशनल शिक्षा, परीक्षा, टीचर एजुकेशन, सूचना एवं संचार तकनीक का प्रयोग, शिक्षा शास्त्र, स्कूल प्रणाली, समावेशी शिक्षा, भाषा और बाल स्वास्थ्य शामिल थे। आज हर कोई स्कूली शिक्षा के लिए इन विषयों की प्रासंगिकताओं को स्वीकारेगा। इससे बढ़कर बात यह है कि कोई भी व्यक्ति इनसे संबंधित अपने सुझाव दे सकता है। उच्च शिक्षा के लिए 20 विषयों का चयन किया गया था, जिसमें उच्च शिक्षा का संचालन, गुणवत्ता, विनियमन, केंद्रीय संस्थाएं, राज्य विश्वविद्यालय, कौशल विकास, ओपेन यूनिवर्सिटी, क्षेत्रीय विषमताएं, लैंगिक और सामाजिक खाई, समाज से जुड़ाव, भाषा, पीपीपी फाइनेंसिंग, उद्योग जगत से जुड़ाव, रिसर्च, नवचार और नया ज्ञान शामिल हैं। इसके अलावा इसमें कई और विषय भी जोड़े जा सकते हैं। इसके लिए 26 जनवरी 2015 से ऑनलाइन विचार विमर्श की प्रक्रिया आरंभ हुई, जिसके जरिए कुछ बिंदु रखे गए और उन पर उनके विचार मांगे गए। 31 अक्टूबर, 2015 तक 29 हजार प्रतिक्रियाएं प्राप्त हुई थीं। मई 2015 में एक लाख दस हजार गांवों, 3015 ब्लॉकों, 406 जिलों और 962 स्थानीय निकायों में जमीनी स्तर पर विचार-विमर्श की प्रक्रिया आरंभ हुई। विभिन्न शिक्षा कमेटियों के सदस्यों, शिक्षकों, प्रधानाचार्यो और शिक्षा से जुड़े सभी लोगों ने इन विषयों पर चर्चा की और अपने सुझाव दिए। 21 राज्यों ने भी स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा पर अपनी प्रतिक्रियाएं दी हैं। इस प्रक्रिया के बाद सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में छह जोनल बैठकें की गई थीं। इस जोनल बैठक में कई राज्यों के शिक्षा मंत्री भी मौजूद थे। इस प्रकार शिक्षा नीति के संबंध में व्यापक विचार-विमर्श हुआ और इस क्रम में तमाम सुझाव हमें प्राप्त हुए। इसके बाद इन सभी सुझावों को समझने और छांटने के लिए टीएसआर सुब्रमण्यम की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई। कुछ लोगों ने अर्थ लगाया कि यह कमेटी नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट तैयार के लिए गठित की गई है। सुब्रमण्यम कमेटी ने बड़े पैमाने पर आए सुझावों की जांच-पड़ताल की। इस कमेटी ने भी शिक्षा से जुड़े विभिन्न लोगों के साथ बैठक की थी। इस गहन और विस्तृत विचार-विमर्श की प्रक्रिया के बाद कमेटी ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे के विकास के लिए भारत सरकार को अपने सुझाव दिए। इस प्रकार जमीनी स्तर पर विचार-विमर्श की प्रक्रिया से आए सुझाव और सुब्रमण्यम कमेटी की सिफारिशों ने नई शिक्षा नीति पर चर्चा और बहस आरंभ करने के लिए महत्वूपर्ण इनपुट दिए हैं। सुब्रमण्यम कमेटी द्वारा दी गईं सिफारिशें शिक्षा नीति का मसौदा नहीं हैं, क्योंकि यह अभी न तो कैबिनेट के समक्ष लाई गई हैं और न ही कैबिनेट ने उन पर मुहर लगाई है। दरअसल यह सिर्फ नई शिक्षा नीति के मसौदे का एक खाका भर है। यहां यह समझना जरूरी है कि किस आधार पर नई शिक्षा नीति का विकास होना चाहिए। भारत के सामने मौजूद चुनौतियों से निपटने और हर व्यक्ति को अवसर मुहैया कराने के लिए नई शिक्षा नीति पांच स्तंभों पर टिकी होनी चाहिए। ये हैं-पहुंच, सामर्थ्य, गुणवत्ता, समानता और जवाबदेही। विगत सत्तर सालों के दौरान शिक्षा को हम हर दरवाजे पर ले गए हैं और इसके विस्तार के अपने लक्ष्य को पाने में सफल रहे हैं। 

अब प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक हर स्तर पर शिक्षा के स्तर को सुधारने की चुनौती है। अर्थात हमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का सपना साकार करना होगा। लिहाजा नई शिक्षा नीति का मुख्य जोर गुणवत्ता पर रखना होगा। नई नीति में सामाजिक न्याय और समानता के तत्वों को शामिल कर शिक्षा को समावेशी बनाना भी समान महत्व रखता है। जाहिर है, हमारे सामने सबसे मुख्य चुनौती तर्कसंगत समाधान खोजना है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता सुधरे और हर स्तर पर सभी छात्रों को अवसर भी मिले। अपने इस लेख के जरिए मैं आप सभी से अपने सुझाव देने की अपील करता हूं। हमने नई शिक्षा नीति के मसौदे के लिए सुझाव देने की तिथि बढ़ाकर 30 सितंबर तक कर दी है। 

अभी हाल ही में संसद के मानसून सत्र में राज्यसभा में भी नई शिक्षा नीति पर संक्षिप्त चर्चा हुई थी, जिसमें कई सदस्यों ने अपने महत्वपूर्ण सुझाव दिए। राज्यसभा के कुछ सांसदों की मांग पर हम उन सांसदों के लिए नई शिक्षा नीति पर एक वर्कशॉप आयोजित करने पर विचार कर रहे हैं जिनकी इसमें रुचि है और जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में काम किया है। इस बीच कुछ लोग नई शिक्षा नीति पर सस्ती राजनीति भी करने की कोशिश कर रहे हैं। यह नहीं होना चाहिए, क्योंकि मेरा मानना है कि शिक्षा एक राष्ट्रीय एजेंडा है, न कि एक पार्टी का एजेंडा। इस प्रकार सरकार की मंशा के ऊपर सवाल उठाने या गलतफहमी पैदा करने और दुष्प्रचार अभियान में लिप्त होने से कोई परिणाम नहीं निकलेगा। मैंने पढ़ा है कि कुछ लोग यह उल्लेख कर रहे हैं कि सरकार संविधान के अनुच्छेद 29 और अनुच्छेद 30 में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को मिले अधिकारों को खत्म कर देगी। उन्हें मैं स्पष्ट कहना चाहूंगा कि हम संविधान में सुनिश्चित अधिकारों में तनिक भी कटौती का इरादा नहीं रखते हैं। साथ ही मैं यह भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि हम ऐसे कदम उठाना चाहते हैं ताकि एससी, एसटी, अल्पसंख्यकों, पिछड़ों और सभी वंचित वर्गो को शिक्षा में समान अवसर प्राप्त हों।

लेखक
प्रकाश जावड़ेकर
(लेखक केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री हैं)

 


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  1. Automatic passing system in school education is worst policy jisne shiksha ka beda gark kr diya hai.

    We value the things that get by efforts.

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