नहीं दिखतीं बच्चों की अठखेलियां

आज है बालश्रम दिवस
ज महंगाई से त्रस्त जीवन में बचपन से ही जिंदगी की जद्दोजहद में उलझ जाना पड़ता है। बालकों की निश्छल, अल्हड़, उन्मुक्त हंसी छिन-सी गई है। अब बच्चों का बचपन सच्चे मायने में देखने को नहीं मिलता। दर्जनों जिम्मेदारियां अथवा अपेक्षाएं बच्चों पर लाद दी जाती हैं। अब बच्चे चाहकर भी अपना जीवन नहीं जी पा रहे हैं। गांव-शहरों की गलियों में टोलियां बनाकर अठखेलियां करते बच्चे अब दिखाई नहीं देते। एक ओर अविकसित देशों में कुपोषण के शिकार बच्चे अपना और परिवार का सहारा बनने के चक्कर में दुकानों, कारखानों या किसी अन्य जोखिम भरे कामों में अपना बचपन गंवा देते हैं, वहीं दूसरी ओर विकासशील देशों में प्रतियोगिता के इस दौर में अभिभावक अपने बच्चों को समय से पहले ही कई तरह की कोचिंग क्लास और न जाने कितनी ही ट्यूशन की भेंट चढ़ा चुके होते हैं। अमीर देशों के अभिभावकों की उम्मीदें अपने बच्चों से अलग ही तरह की होती हैं। 

अगली पंक्ति की पोजीशन बनाए रखने के चक्कर में या तो अभिभावक बच्चों के लिए समय ही नहीं निकाल पाते या फिर अपने बच्चों के बूते से बाहर उम्मीदें रखकर उन्हें हरफनमौला बनते देखना चाहते हैं। बची-खुची कसर टीवी के पर्दे की चकाचौंध पूरी कर देती है। उससे भी अधिक अपने देश का नाम रोशन करने के लिए ओलंपिक की कठिन तैयारी में दर्दनाक तरीके उनके बचपन को लील लेते हैं और इन सब में उनका बचपन कहीं पीछे छूट चुका होता है। दूसरी ओर यह भी कहा जाता है कि बाल मजदूरी करना या कराना अपराध है। कहने का मतलब यह कि तरीका चाहे जो भी हो, पिसता तो बचपन ही है। 

जबकि बच्चों के सहज विकास के लिए जरूरी है कि उनपर अनावश्यक बोझ न लादा जाए। नौनिहालों को कामगार न बनाकर उन्हें भरपूर उनका बचपन जीने दिया जाए। उनके बालमन को उन्मुक्त गगन में उड़ने दिया जाए। बचपन के मस्त खिलंदड़पन ही भावी जीवन का आधार तैयार करता है। अनावश्यक हस्तक्षेप तो दरअसल लड़कपन को छीन लेता है।दूसरी ओर देखें तो आए दिन बच्चों के अपहरण की खबरें आती रहती हैं। इस गोरखधंधे के पीछे सुनियोजित गैंग बताए जाते हैं, जो बच्चों को मजदूरी, देह व्यापार या अंगों की खरीद-फरोख्त के लिए बेच देते हैं। ये गैंग गरीबों के बच्चों को निशाना बनाते हैं। निर्धन परिवार के बच्चों को आसानी से फुसलाते हैं और अगवा कर लेते हैं। ज्यादातर बच्चों को गुप्त ढंग से दूसरे राज्यों में ले जाया जाता है। गैर-सरकारी संगठन बचपन बचाओ के मुताबिक, भारत में 2008 से 2010 के बीच एक लाख 20 हजार बच्चे गुम हुए। अकेले राजधानी दिल्ली से ही 13 हजार 570 बच्चे खो गए। इस संदर्भ में पुलिस ऐसी कुछ जगहों की पहचान कर चुकी है, जहां से बच्चे उठाए जाते हैं। इनमें से ज्यादातर राजधानी शहर के बाहरी इलाके हैं। दिल्ली पुलिस के मुताबिक, बीते साल 16 जुलाई से 15 सितंबर के बीच यानी सिर्फ तीन महीनों में एक हजार 153 बच्चे लापता हुए, जिनमें से 465 का कोई अता-पता नहीं है। दरअसल, दुनिया भर में बड़ी संख्या में बच्चे मजदूरी कर कर रहे हैं। इनका आसानी से शोषण किया जाता है। वे परिवार से दूर अकेले शोषण का शिकार होते हैं। घरों में काम करने वाले बच्चों के साथ तो और भी बुरा व्यवहार होता है। हमारे देश में बाल मजदूरी की समस्या तो विकराल है ही, फिर भी कहीं-कहीं कुछ अच्छी कोशिशें भी अब नजर आने लगी हैं। तमिलनाडु और मध्य प्रदेश के कर्मचारी संघों में ग्रामीण सदस्य कोशिश कर रहे हैं कि उनका गांव बालश्रमिक विहीन बने। कई लोग बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए एक साथ काम कर रहे हैं। देश में बाल मजदूरी की स्थिति पर बात करें तो 1992 में यह कहा गया था कि भारत की आर्थिक व्यवस्था को देखते हुए बाल मजदूरी हटाने का काम क्रमश: किया जाएगा, क्योंकि इसे एकदम से रोका नहीं जा सकता। लेकिन दुख की बात यही है कि आज 24 साल बाद भी हम बाल मजदूरी खत्म नहीं कर पाए हैं। आंकड़ों के अनुसार, एक करोड़ बच्चे बालश्रम में लिप्त हैं, जबकि यह बात सब जानते हैं कि यह संख्या वास्तविक नहीं हो सकती। बहरहाल, बालश्रम पर रोक का लक्ष्य पूरा न हो पाने के कई कारण हैं। हमारे देश में बच्चों के लिए कई अधिनियम हैं। हर एक्ट में बच्चे की उम्र का पैमाना अलग-अलग है। इससे उन लोगों को फायदा हो जाता है, जो मजदूरों को रखते हैं। दूसरा मुद्दा यह है कि बच्चों के लिए काम करने वाले स्वास्थ्य, श्रम जैसे अलग-अलग विभागों के बीच आपस में कोई सामंजस्य नहीं है। चाइल्ड लेबर एक्ट की कई ऐसी बातें हैं, जो चाइल्ड लेबर एक्ट में ली ही नहीं जातीं। मसलन, पारिवारिक धंधे में भी बच्चे लगाए जाते हैं- खेती में या फिर मछली पालन उद्योग में, या फिर छोटे-मोटे दूसरे कामों में। ऐसे बच्चों की संख्या का कोई आंकड़ा नहीं है। मान लिया जाता है कि जो घरेलू स्तर पर काम कर रहे हैं, वे सुरक्षित ही होंगे। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। यहां भी शोषण की कई खबरें सामने आती हैं। यूएन सीआरसी की परिभाषा कहती है कि जो भी बच्चे ऐसे कामों से जुड़े हैं, वे अपने बचपन से वंचित हो गए हैं। अपने सामर्थ्य और गौरव से वंचित हैं। यानी उनके मानसिक और शारीरिक विकास के लिए जो भी काम हानिकारक हैं, वे भी बालश्रम कहलाते हैं। उम्र के हिसाब से अगर बात करें तो 10 से 14 साल की उम्र के बच्चों से मजदूरी के मामले में पश्चिम बंगाल, गुजरात, असम, कर्नाटक व उत्तर प्रदेश का हाल बहुत बुरा है। वहीं दिल्ली की बात करें तो वहां सबसे बड़ी समस्या गायब होते बच्चों की है। वहां हर दिन कम से कम 14 बच्चे गायब हो जाते हैं। ये बच्चे या तो बाल मजदूरी का शिकार होते हैं या फिर तस्करी का।बच्चों से जुड़ी इस समस्या का कारण यही है कि बालश्रम अधिनियम के अंतर्गत बच्चों से मजदूरी करवाने की जो सजा है, वह बिल्कुल सख्त नहीं है। इस अपराध के लिए दोषी को या तो तीन महीने की सजा दी जाती है या फिर 20 हजार का जुर्माना देना होता है। तात्पर्य यह है कि दोनों में से एक ही सजा मिलती है तो अधिकतर लोग जुर्माना देकर छूट जाते हैं। और फिर ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई भी नहीं होती।

लेखिका
पूनम श्रीवास्तव
dha_kusriva@rediffmail.com

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