आज  एक नजर शिक्षक संघ पर -

पहले एक संघ था एक चटाई थी । एक ही बैनर तले शिक्षक अपनी आवाज उठाते थे । जब एक संघ था तो एकछत्र राज था।  कोई रोकने टोकने वाला नही था।  ब्लाक या जिले स्तर के नेतृत्व के गुडबुक वाले संघ के सच्चे सिपाही माने जाते थे।  इतर व्यक्ति 'संघविरोधी' कहलाते थे।  जो भी विरोध दर्शाता उसे 'संघविरोधी' की उपाधि दे दी जाती थी। वो चुनाव लडने व वोट डालने से भी प्रतिबन्धित किए जाते थे। तब चुनाव मे बडा बवाल होता था। विपक्षी हमेशा कहते पाये जाते कि धांधली हुई है।  रसीद भी उन्ही की कटती थी जो संघ के 'सच्चे सिपाही' थे।  डेलीगेट्स भी चुन-चुनके बनाए जाते थे। मतलब संघ का चुनाव कमोबेश प्रधानी के चुनाव की तरह गहमागहमी लिए रहता था।


अब वो चुनावी धमाचौकडी गायब है। अब पदाधिकारीगण बिना चुनाव के ही मनोनीत कर लिए जाते हैं। मजे की बात है कि अब कोई संघ विरोधी नही रहा,  दो संघ जो हो गए।  जो 'संघ विरोधी' थे अब वो भी संघवाले हो गए। अब उन्हे भी नारे लगाने की आदत डालनी पड रही।  अब चटाई दो होने के कारण बैठने वाले भी अलग अलग संघ के प्रति निष्ठावान हो गए हैं।  पहले धरने आदि मे भीड़ जुटाने मे बडी मशक्कत करनी पडती थी।  बडी मिन्नतें करनी पडती थी तब जाकर कोई धरना-प्रदर्शन सफल हो पाता था। तब उस धरने से उन 'संघविरोधियों' को कोई लेना देना नही होता था, पर अब नाक का सवाल है  कि अब वही खुद एक संघ बन गए हैं । अब दोनो तरफ से धरने का ऐलान होता है। होड़ मे पिछडने का मतलब लडाई से बाहर ...।


दोनो धरने मे जबरदस्त भीड़ एक शानदार दूसरा जबरदस्त। कोई किसी से कम नही । जितनी भीड एकछत्र राज वाले संघ मे आती थी उससे ज्यादे लोग अब अलग अलग संघों के धरने मे आ रही है। इसमे एक बात तय है कि अब शिक्षकों की धरने मे सहभागिता बढ गई है।  जो कभी नही गए थे वो भी जाने को विवश हो गए।  व्यक्तिगत नाक का प्रश्न जो बन गया।


पहले भी दो गुट थे जिन्हे 'पक्ष-विपक्ष' या 'संघी-संघविरोधी'  आदि से परिलक्षित किया जाता था अब उक्त दोनो 'संघ' ही कहलाते हैं।  हां फर्क इतना ही है कि ये अब 'असली-नकली' से परिलक्षित होते हैं। मजे की बात है कि दोनो अपने को 'असली' कहते हैं 'नकली' कोई कहलाना नही चाहता।  दोनो अपनी वैधता को सिद्ध करने की प्रामाणिक दलीलें भी देते हैं।  अब इसी मे 'असलियत' भी सामने न आ पाए इसकी भी जद्दोजहद होती है। दोनो के समर्थक भी पीछे हटने को तैयार नही। पहले अघोषित सुस्ती थी अब घोषित फुर्ती।


अब इन्ही सब विडंबनाओं के बीच एक सकारात्मक दृष्टि सामने आती है जो शायद शिक्षकहित मे उचित भी है । ये हैं कुछ बिन्दु -


 अब कोई मुद्दा छूटता नही ।
 अब समस्याओं के निस्तारण की होड़ मची रहती है ।
 अब किसी को संघ से शिकायत नही क्योंकि लगभग सभी खुद किसी न किसी संघ के अंग हैं।

अब एक सवाल - क्या संघ एक होना चाहिए ?? 
यदि हां तो वो पहले वाली कमियों को सुधारने के क्या उपाय हैं ??


नही तो दो पक्ष पहले भी थे दो आज भी हैं । बस बदला है तो सांगठनिक गतिविधियों मे शिक्षकों की सहभागिता का फैलाव और ये शिक्षक हित मे शायद सकारात्मक ही है ।


(  ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं इसे किसी व्यक्ति/संगठन के समर्थन/विरोध के रूप मे नही देखा जाए। हाँ इस संबंध मे अपने विचार भी रख सकते हैं। )

"आपकी बात" में आज देवरिया से शिक्षक साथी
श्री 'वेदप्रकाश दुबे' 'वेद'

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  1. काफी हद तक आपके विचारों से सहमत है वेद जी।

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