शिक्षा संस्थानों की फीस का सवाल

वक्त के साथ फीस वृद्धि होगी ही, लेकिन यह भी देखना होगा कि कोई गरीब छात्र इसके चलते उच्च शिक्षा से वंचित न रहे


देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू एक बार फिर विवाद के केंद्र में है। विवाद का मुख्य मुद्दा है छात्रवास और मेस की फीस, जिसके खिलाफ छात्र आंदोलित हैं। बढ़ी फीस में कटौती के बाद भी उसे लेकर सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक हंगामा है। इसमें विश्वविद्यालयों के शिक्षक भी शामिल हो गए हैं। फीस को लेकर छात्रों की मांग कितनी जायज है? नई शिक्षा नीति के प्रस्तावित मसौदे में इस मामले में क्या रुख है? 


इन सवालों पर विचार करने के साथ ही यह जानना प्रासंगिक होगा कि निजी क्षेत्र में फीस की क्या स्थिति है, क्योंकि उच्च शिक्षा संस्थानों की बहुत बड़ी संख्या निजी क्षेत्र में है? वामपंथी, कांग्रेस समेत अन्य विचारधाराओं के छात्र संगठनों के साथ-साथ भाजपा समर्थक छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद भी फीस वृद्धि के खिलाफ है। फीस बढ़ाए जाने के पीछे एक कारण विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा बजट में कटौती को भी बताया जा रहा है। प्रस्तावित नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा को लेकर बहुत ही महत्वाकांक्षी लक्ष्य हैं। मसलन उच्च शिक्षा में युवाओं (18-23 वर्ष) की सकल नामांकन दर (जीईआर) को 2020 तक 30 प्रतिशत और 2035 तक 50 प्रतिशत तक ले जाना। अभी यह 25 फीसदी के लगभग है। विकसित देशों को तो छोड़िए, ब्राजील और चीन तक में यह जीईआर क्रमश: 50 और 44 प्रतिशत है।

नई शिक्षा नीति के तहत शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए 800 से अधिक उच्च शिक्षा संस्थानों के बुनियादी ढांचे में सुधार, 70 नए आदर्श कॉलेजों की स्थापना, बड़ी संख्या में नए मेडिकल कॉलेज, नए छात्रवास आदि की योजना है। इनके लिए बड़ी मात्र में धनराशि चाहिए, लेकिन यह ध्यान रहे कि वैश्विक आर्थिक मंदी से भारत भी प्रभावित है और सरकारी बजट की भी एक सीमा है। महंगाई और दिल्ली जैसे महानगर को देखते हुए जेएनयू में फीस बढ़ोतरी मध्यम वर्ग के छात्रों के लिए बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन गरीब छात्रों के लिए यह अतिरिक्त बोझ है। उन्हें बढ़ी हुई फीस से परेशानी होना स्वाभाविक है। एक अनुमान के अनुसार इस समय देश में गरीबी रेखा के नीचे लगभग 22 से 23 करोड़ लोग हैं जिनकी पारिवारिक मासिक आय दस हजार रुपये से भी कम है। इस आय वर्ग के अनेक छात्र जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय समेत विभिन्न सरकारी शिक्षा संस्थानों में पढ़ते हैं। इनके लिए एक-एक रुपया जुटाना भारी है। इस आय वर्ग के छात्रों का आंदोलित होना स्वाभाविक है। 

कम फीस वाले सरकारी संस्थानों में एक अनुमान के अनुसार 25 से 30 प्रतिशत छात्र गरीब या निम्न आय वर्ग के होते हैं। वहीं 40 से 50 प्रतिशत छात्र निम्न मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के होते हैं। यह वर्ग फीस देने की स्थिति में होता है। ऐसे में अधिक आय वर्ग वाले विद्यार्थियों से ज्यादा फीस क्यों न वसूल की जाए ताकि बढ़ी फीस के कारण गरीब प्रतिभाशाली विद्यार्थी उच्च शिक्षा से वंचित न होने पाएं। सरकार को यह भी देखना चाहिए कि गुणवत्तापरक उच्च शिक्षा के कुछ ही केंद्र न रहें और ऐसी व्यवस्था की जाए जिससे देश भर में गुणवत्तापरक शिक्षा मिल सके। इसके लिए दूरदराज के उच्च शिक्षा संस्थानों में सुधार करने और साथ ही नए गुणवत्तापरक संस्थान खोलने की जरूरत है।

यह राहतकारी है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में शिक्षा पर कुल सरकारी व्यय कीमौजूदा 10 प्रतिशत राशि को अगले दस वर्षो में 20 प्रतिशत करने की सिफारिश की गई है। देश में शिक्षा की व्यापक जरूरतों को देखते हुए यह राशि भी नाकाफी है। जाहिर है कि समय के साथ फीस तो बढ़ानी ही पड़ेगी, लेकिन इसी के साथ यह उपाय भी करना होगा कि कोई गरीब विद्यार्थी फीस की वजह से उच्च शिक्षा से वंचित न रहे। हालांकि जेएनयू में छात्रों को छात्रवृत्ति मुहैया कराई जाती है, लेकिन शिक्षा में बढ़ते हुए नए खर्चो को देखते हुए वह नाकाफी है। बेहतर हो कि गरीब विद्यार्थियों के लिए छात्र-ऋण का एक नया मॉडल बनाया जाए। बीपीएल रेखा से नीचे के छात्रों को शून्य प्रतिशत दर पर और न्यून आय वाले तबके के छात्रों के लिए तीन-चार प्रतिशत दर पर शैक्षणिक ऋण आसानी से उपलब्ध कराया जाना चाहिए। सरकार को शैक्षणिक ऋण प्रक्रिया में संशोधन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त वैकल्पिक आर्थिक संसाधनों की भी तलाश की जानी चाहिए। सीएसआर के तहत प्रावधान किया जा सकता है कि इस धन का एक हिस्सा गरीब विद्यार्थियों को स्कॉलरशिप के रूप में दिया जाए। प्रत्येक संस्थान में पूर्व छात्रों का एलुमनाई एसोसिएशन खोला जाना चाहिए, जो गरीब छात्रों के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करने में सहायक हो सके। अमेरिका और यूरोप में ऐसी एलुमनाई एसोसिएशन आम हैं। इसी के साथ साधन संपन्न लोगों को शिक्षण संस्थानों से जुड़ने और आर्थिक मदद देने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। भारतीय संस्कृति में धर्मशाला, प्याऊ, स्कूल और अस्पताल आदि खोलने की पुरानी परंपरा रही है। इस परंपरा को फिर से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसके अलावा विद्या के लिए दान को प्रोत्साहन देने के लिए आयकर अधिनियम में यह संशोधन होना चाहिए कि सभी सरकारी शिक्षण संस्थाओं को दिए गए दान को आयकर छूट मिलेगी।
अगर हम निजी क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों पर गौर करें तो पाएंगे कि इन संस्थानों की जो फीस है वह गरीब और निम्न मध्यम वर्ग को तो छोड़िए, मध्यम वर्ग की भी पहुंच से बाहर होती जा रही है। समय आ गया है कि निजी शिक्षा संस्थानों का सम्यक नियमन किया जाए। ध्यान रहे कि शिक्षा का व्यवसायीकरण न हो, इसका उल्लेख नई शिक्षा नीति के मसौदे में भी है। यह बात और है कि इस मसौदे में इसका कोई विस्तृत रोडमैप नहीं दिया गया है। उचित यह होगा कि निजी शिक्षासंस्थानों की लागत के अनुपात में फीस की एक अधिकतम सीमा निर्धारित की जाए ताकि इन संस्थानों को भी नुकसान न हो और कम आय वर्ग के छात्र उनमें शिक्षा भी प्राप्त कर सकें। गरीब और निम्न मध्यम वर्गीय तबके के छात्रों को गुणवत्तापरक उच्च शिक्षा मिले, यह उनकी सामाजिक गतिशीलता और देश की चतुर्दिक प्रगति के लिए आवश्यक है। इस प्रगति रूपी राष्ट्र यज्ञ में समाज के सभी तबकों की आहुति हो, यह सुनिश्चित किया जाना समय की मांग है।



लेखक
प्रो. निरंजन कुमार
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं)

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