इतिहास के पुनर्लेखन का वर्ष  :  वर्ष 2019

(नववर्ष 2020 की पूर्वसंध्या पर लिखा गया एक संस्मरणात्मक आलेख)


जैसे -जैसे दिसम्बर 2019 का तारीखी कैलेण्डर अपनी आखिरी साँसें गिन रहा है शीत ऋतु और जवान होती जाती है। मानो शीत अपने चरम को छू लेना चाहता है। वर्षा, कोहरा- पाला, ओलावृष्टि, हिमवृष्टि और शीत लहर का कहर सभी को अपने आगोश में समेट लेना चाहता है। 


ज्यों - ज्यों शीत ऋतु का कारवां आगे बढ़ता जाता है ठिठुरन और गलन का मंजर सामने आता जाता है। शीत ऋतु के इस रौद्र रूप को देखकर सभी जीव - जन्तु, पेड़- पौधे, काँप रहे हैं और सूर्यदेव पितामह भीष्म की तरह आँखे झुकाए मौन साधे बैठे हैं। अलाव की आग ही जीवन- संचार का सम्बल बन गयी है। आदिमानव का वही अचूक हथियार - आग। 


कालचक्र की गति देखिए वही निर्जीव काठ ( काष्ठ) सजीवों में ऊष्मा के संचार का निमित्त बन गया है जिसे भौतिकता की दौड़ में हम कहीं भूल-सा गए हैं। अलाव हमारी संस्कृति है। अलाव इंसानियत की लौ है। अलाव जोड़ता है। अलाव भेद रहित है। ये हमें अपनी ओर खींचता है, बुलाता है। अलाव गरमाता है और जमा हुआ मन घुलने लगता है। चर्चाओं का एक सिलसिला जन्म लेता है। मौसम की चर्चा, राजनीति की चर्चा, खेती- किसानी की चर्चा और देश- दुनिया की चर्चा।
 


आज जब वर्ष 2019 विदा होने को है और जिन्दगी की दहलीज़ पर वर्ष 2020 की पदचाप साफ़- साफ़ सुनायी पड़ रही है तब मन में विदा होते वर्ष 2019 के कालखंड का घटनक्रम परत दर परत खुलता जाता है। जम्मू और कश्मीर राज्य से अनुच्छेद 370 और 35 A की समाप्ति और दो केन्द्र शासित राज्यों का गठन, अयोध्या के सदियों पुराने राम - मंदिर विवाद और मुस्लिम समाज में प्रचलित तीन तलाक जैसी प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, पाकिस्तान के बालाकोट में घुसकर भारतीय वायुसेना का आतंकी शिविरों पर हमला और नागरिकता संशोधन कानून  वर्ष 2019 के आकाश के वे इंद्रधनुषी रंग हैं जो कभी धूमिल नहीं होंगे। 


यदि वर्ष 2019 को इतिहास के पुनर्लेखन का वर्ष कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। वर्षों की जड़ता पर न्यायपालिका और विधायिका के फैसलों का यह आघात और प्रतिक्रियास्वरूप घात- प्रतिघात और सत्ता के शिखर तक पहुँचने की दुरभिसंधियों के साथ वर्ष 2019 अलविदा चाहता है लेकिन बेसिक शिक्षा के परिवर्तनों की चर्चा किए बगैर मानो यह विदाई अधूरी है। 


बेसिक में " प्रेरणा " के आने की आहट और उससे उपजी घबराहट हर ओर महसूस की जा सकती है। बेसिक नई चाल में ढलने को आतुर है। विद्यालयों का संविलियन, एबीआरसी पद का विलोपन, एआरपी का सृजन, दीक्षा से शिक्षण और प्रेरणा से ताबड़तोड़ निरीक्षण की तैयारी पूरी है। कम्प्यूटर, लैपटॉप और टैबलेटधारी शिक्षक ही बेसिक के भावी हनुमान सिद्ध होंगे जिनसे बेसिक को संजीवनी बूटी मिलेगी। कार्यशैली और व्यवस्थाओं के इस तीव्र परिवर्तन से शिक्षक कुछ असहज -सा है। उसे कुछ सूझ नहीं रहा कि स्कूल में घर बनाए या घर में स्कूल। दोनों ही उसके वश की बात नहीं। शिक्षक डायरी और पाठ योजना की विभागीय हठ उसे किसी आपदा से कम नहीं लगती । 


शिक्षकों की लामबंदी और कामबंदी भी सरकार को अपने निर्णयों पर पुनर्विचार के लिए विवश नहीं कर सकी है। ऐसे में यही कहना समीचीन होगा कि वर्ष 2019 पर आने वाला वर्ष बीस ही साबित होगा। वर्ष 2019 तो मानो बीत ही गया कुछ घंटे ही शेष बचे हैं और आप उसे शुक्रिया न भी कहें तो भी वह लौटकर आने वाला नहीं है और नववर्ष के आगमन पर आप पलक- पाँवड़े न भी बिछाएं तो भी आप उसे रोक नहीं पाएंगे। वह आएगा और अपने निर्धारित समय पर आएगा। बस हर काल और परिस्थिति से जूझने के लिए सदैव तैयार रहिये। 


कवि शमशेर बहादुर सिंह  ने कहा था कि काल तुझसे होड़ है मेरी। मुझे लगता है कि सभी की जिदंगी इस होड़ में शामिल हैं। बस देखना यही है कि इस होड़ में सिकंदर कौन बनता है। आगत का स्वागत है और मेरी यही शुभकामना है कि इस होड़ के सिकंदर आप ही बनें। 

आपको नववर्ष मंगलमय हो।


✍ लेखक :
प्रदीप तेवतिया
वि0ख0 - सिम्भावली,
जनपद - हापुड़
सम्पर्क : 8859850623



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