बेहतर बनने की राह पर बढ़ते शिक्षक

शिक्षा से जुड़े मसलों पर शिक्षकों का विचार-विमर्श करना देश की शैक्षणिक तस्वीर बदल सकता है ।

पिथौरागढ़ में एक शाम हमने अब्बास कियारोस्तानी की फिल्म ह्वेयर इज द फ्रेंड्स होम देखी। करीब 35 दर्शक थे हम, जिनमें से ज्यादातर सरकारी स्कूलों के शिक्षक थे। फिल्म फारसी भाषा में थी, जिससे सब अनजान थे। बावजूद इसके यह कियारोस्तानी का कमाल था कि हम सीट से चिपके रहे। गैर-पेशेवर व स्थानीय कलाकारों से सजी यह फिल्म सात साल के बच्चे अहमद के इर्द-गिर्द घूमती है। एक रोज भूलवश अहमद स्कूल से अपने दोस्त का नोटबुक ले आता है, जबकि होमवर्क न करके लाने पर शिक्षक ने उस दोस्त को अगले दिन स्कूल से निकालने की चेतावनी दी थी। अहमद नहीं जानता था कि उसका वह दोस्त रहता कहां है? अब वह उसे कैसे खोजे, यह फिल्म इसी बात को दर्शाती है। 

फिल्म में अहमद लगातार बड़ों की उस दुनिया से टकराता है, जो आम तौर पर बच्चे को समझने में नाकाम रहती है और अनजाने में उस पर हावी हो जाती है।फिल्म देखने के बाद शिक्षकों ने इस पर अपनी-अपनी राय रखनी शुरू की। सवाल उठा कि क्या यह अहमद की दयालुता थी या उसका कर्तव्य, जिसने उसे दोस्त को ढूंढ़ने के लिए प्रेरित किया या फिर इसके पीछे की वजह कुछ और थी? फिल्म में स्कूल का अपनापन भी शिक्षकों को गुदगुदा रहा था। लगभग सभी ने यह माना कि बच्चों को समझने में बड़े अक्सर नाकाम रहते हैं। अहमद के दादा की चर्चा खासतौर पर हुई कि आखिर क्यों बड़े लोग बच्चों को मारते हैं?

बहरहाल, एक छोटे-से शहर में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का इस तरह फारसी फिल्म देखने पर कई लोगों को आश्चर्य हो रहा होगा। मगर यह खुशी की बात जरूर होगी कि फिल्म देखने के बाद इस तरह की चर्चा हुई। यह मत सोचिए कि फिल्म दिखाने की कोई घोषणा की गई होगी और शिक्षक यूं ही उसे देखने आ पहुंचे। असल में, यह एक समूह है, जो शिक्षा से जुड़े मसलों पर लगातार काम करता है। शिक्षकों को जब भी मौका मिलता है, वे किसी शाम को एक जगह जमा होते हैं, और पाठ्यक्रम से जुड़ी परेशानियों से लेकर उन तमाम मुद्दों पर अपने विचार साझा करते हैं, जिनसे वे स्कूलों में जूझते हैं। इनमें ऐसे मसले भी होते हैं, जिनका शिक्षा में व्यापक प्रभाव है; इस फिल्म की तरह। शिक्षक किसी ‘इंसेंटिव’ के लालच में नहीं, बल्कि अपनी मर्जी से इसके सदस्य बनते हैं, ताकि वे एक अच्छे शिक्षक बन सकें।यह समूह यूं ही नहीं बना है। कुछ लोगों ने इसके लिए काफी मेहनत की है। उनकी प्रतिबद्धता ही इसे जीवंत बनाए हुए है। बाहर के लोगों से भी ये लगातार बात करते रहते हैं, ताकि यह समूह वैचारिक रूप से शिथिल न हो जाए। इस तरह की पहल को बढ़ावा देना और ऐसी संस्कृति का विकास करना शायद हमारे 80 लाख शिक्षकों के पठन-पाठन में सबसे जरूरी हस्तक्षेप साबित हो। भारत में शिक्षा जगत की तस्वीर को सुधारने में इस तरह की पेशेवर पहल उपयोगी हो सकती है। 

लेखक
अनुराग बेहर
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Post a Comment

  1. Nasir kamal assist teacher DEORIA... Mai bhi kisi aisi hi group se judana chahat hoon...9044439527

    ReplyDelete

 
Top