भारत देश विश्व गुरु या भारत माता ही तो है, शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति ही नहीं बल्कि जीवन का हर पल, सृष्टि का हर कण, हर जीव ये सभी गुरु के समान ही तो हैं जो अंधकार से प्रकाश की राह दिखा दे। ये धरती भी तो मां कही जाती है और रीति मतलब परम्परा और प्रीति मतलब परिवार, विद्यालय परिवार भी हमारा परिवार है। शिक्षा का उद्देश्य तो ज्ञान और संस्कार देना ही सर्वप्रथम होता है परन्तु समाज में विद्यालयों एवं गुरु की धूमिल होती छवि के लिए क्या एकमात्र शिक्षक वर्ग ही दोषी है जो कहीं न कहीं किसी ज्ञात मगर अनकहे कारणों से घुटन भरी मरणतुल्य जिंदगी जीने को विवश हैं।
    लगभग दो सौ सालों पूर्व ही ग्लोबल वार्मिंग की शुरुआत के बीज बोये गये मगर आज दिखाई देने लगा कि ये धरती मां भी कितनी तकलीफ से गुजर रही है, संवेदनाओं को सहेजना तो बहुत कठिन जान पड़ने लगा है हर किसी के लिए आखिरकार क्यों ? पेड़ लगाना और आत्मबोध की छाया की पृष्ठभूमि तैयार करना एक समान है लेकिन जब कोई कुल्हाड़ी किसी पेड़ की जड़ों को ही काट देने पर आतुर हो तो उस कुल्हाड़ी के पीछे उसी पेड़ के हिस्से की महत्वपूर्ण भूमिका होती तो है फिर भी सत्य उजागर करने में  जान जोखिम में डालने जैसा ही है कैसे कहें हम कि मां का आँचल मैला कौन कर देना चाहता है और किसलिए , धरती भी आग में झुलसती जा रही है ये कैसी आग है जो दुनिया ही खत्म कर देना चाहती है ? ये आग कब बुझेगी ?
       जनता जनार्दन बनाती है सरकार और सरकारें बनाती हैं नियमावली लेकिन बीच में हम सरकारी नौकर परिषदीय अध्यापकों के हाथ में शिक्षा विभाग से लेकर अन्य कई विभागों के काम-काज की प्रमाणिकता की बागडोर थमा दी जाती मगर जब हम अपना काम जो कि शिक्षा और संस्कार देना चाहें जनता से लेकर अन्य कोई विभाग क्या खुद अपने ही साथी , अपने ही विभाग के लोग नही समझते और न तो साथ देते हैं।
         अनेक प्रकार की विपरीत परिस्थितियों में भी यदि कोई अध्यापक अपना काम निष्ठापूर्वक करना चाहे और नियमानुसार चले तो सबसे पहले तो खुद अपनी और अपने परिवार की इज्जत और जान तक जोखिम में डालने की नौबत आ जाती है,सच बयान करने का साहस या धैर्य तो किसी में दिखता नहीं और झूठ  की शहनाईंयां ही बजती रहती हैं ऐसे माहौल में हम ही बराती और हम ही घराती बनते रहते हैं। परिवारों से ही ये संसार बसा है, पूरा संसार ही परिवार जैसा है तथा हमारा विद्यालय केवल विद्यालय नही बल्कि परिवार की तरह शिक्षा और संस्कार की पाठशाला ही है।
     अनगिनत योग्यतायें भीतर ही भीतर तिलमिला रहीं हैं मगर कुछ कह नही सकती किसी से, अगर सिर्फ बातों से ही संसार चल सकता तो ये दो हाथ-पैर और एक दिमाग भी तो है सबके पास लेकिन जो कर्मठ है वो केवल अपने कर्तव्य और आत्मसम्मान, स्वयं अपने आप का मूल्यांकन करता है |
        आसमान पर उड़ने वाला पक्षी पेड़ों की छांव और ऊँचे उड़ने वाले हवाई जहाज को चलाने वाला भी अन्न और जल की आशा धरती मां की गोद से लगाता है ठीक इसी तरह कर्मठ गुरु के साथ ही साथ अबोध बच्चों के भविष्य को प्रकाशवान करने की दिशा में हम शिक्षक वर्ग की आशा भरी निगाहें लगी हैं , कब इंसाफ मिलेगा ये सवाल केवल मेरे नहीं हैं मगर जवाब की प्रतीक्षा हर किसी को है ? हमें भी इंसाफ चाहिये.................
लेखिका
निरुपमा मिश्रा
बाराबंकी- उ० प्र० ( भारत)



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    1. शुभ आशीर्वाद प्रिय अनुज स्वप्निल,,,,,,,

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